विक्रम सिंह / सुल्तानपुर
पहले राष्ट्रकवि कहे जाने वाले हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकार व महान कवि पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने यूं तो इलाहाबाद में ज्यादा वक्त गुजारा। वहीं रहकर स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भागीदारी की लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में अपने गृहजनपद सुल्तानपुर आ गए। उन्हीं के समकालीन थे उस वक्त के दिग्गज कांग्रेसी व तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष पंडित देवकलीदीन। अपनी ईमानदारी व नैतिकता के लिये पंडित देवकली दीन की भी काफी शोहरत थी। कविवर पंडित रामनरेश त्रिपाठी जी व पंडित जी दोनों की परस्पर कभी नहीं पटी। मौके आने पर दोनों बड़े ही बेबाकी से एक-दूसरे की टांग खिंचाई में चूकते नहीं थे।
इन दोनों शख्सियतों के समकालीन रहे स्व.पंडित रामकिशोर त्रिपाठी ने एक बार इस संदर्भ में बड़ा ही रोचक संस्मरण सुनाया था, जो इस प्रकार है…
“उनकी-इनकी कभी नहीं पटी। एक दिन रामनरेश त्रिपाठी जी ने चिट्ठी लिखकर जिला परिषद (उस वक़्त जिला पंचायत को जिला परिषद कहा जाता था) अध्यक्ष पंडित देवकली दीन से मोटर कार मांगी जिला परिषद की। उन्होंने मोटर कार देने से इंकार करते हुए चिट्ठी का जवाब लिख भेजा कि , ये ‘देव’यान है। इसपर जबतक देव नहीं बैठेंगे तबतक यह यान हिलेगा नहीं। यह किसी को दी नहीं जा सकती। त्रिपाठी जी ने देवकली दीन की जवाबी चिट्ठी पाकर नहले पे दहला जड़ते हुए उन्हें एक कविता लिखकर भेज दी-
देवकली दीन की मोटर है बेकार।
कांग्रेस के धींगरे चढ़ें, शरीफन को इंकार।।
त्रिपाठी जी के इस पलटवार से बौखलाए पंडित देवकली दीन को मानो कांटो तो खून नहीं..! उन्होंने भी उलटकर लिख दिया-
देवकली दीन की मोटर है वाकार।
काना है पीछे पड़ा, कुशल करें करतार।।”
इस किस्से को आज भी पुराने लोग सियासी चौपालों में नई पीढ़ी के लोगों को रोचक ढंग से सुनाते रहते हैं।
