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संडे स्तंभ : वोटर हाशिए पर

विमल मिश्र
मुंबई

आबादी में उनकी तादाद कम है और राजनीति में ज्यादा वजन नहीं। इसीलिए चाहे संसद या लोकसभा के चुनाव हों या महानगरपालिकाओं या पालिकाओं के – उनकी परवाह किसी को नहीं है। महाराष्ट्र की महानगरपालिकाओं के चुनाव भी कुछ अलग नहीं हैं। ये लोग अभी तक इंतजार में हैं कि राजनीतिक दल उन्हें अपना उम्मीदवार बनाएं, ताकि चुने जाने पर अपनी समस्याएं सुलझाने का मौका उन्हें खुद मिल सके।
दिव्यांग
देश में दिव्यांगों और बधिरों की बड़ी तादाद को देखते हुए इस चुनाव में भी हर राजनीतिक पार्टी और उम्मीदवारों के घोषणापत्र में उनके लिए लुभावने वादे दिखते हैं। इनमें उनके अधिकारों के लिए विधेयक पास करने और शिक्षा व रोजगार जैसे काम के वादे भी हैं, पर अधिकतर दलों में मोटे तौर पर इस मुद्दे पर उलझाव ही दिखता है, बल्कि ज्यादातर राजनीतिक उम्मीदवारों को उनके मुद्दों की जानकारी तक नहीं है। ADAPT (Able Disable All People Together) ने ऐसे लोगों के लिए एक ‘चार्टर ऑफ राइट्स’ जारी किया है। इनमें उनके अधिकारों के लिए कानूनी प्रावधान किए जाने, उनके लिए समावेशी नि:शुल्क शिक्षा व सर्व सुविधा संपन्न शिक्षा संस्थाओं की व्यवस्था, आधारभूत ढांचे, खासकर ट्रांसपोर्ट के साधनों, सार्वजनिक स्थलों, सामाजिक और मनोरंजन के जरियों तक पहुंच कायम करना, रेलवे किराये व आरक्षण में कोटा, तीर्थयात्रा व पर्यटन में छूट, सिंगल विंडो सिस्टम, रोजगार के लिए व्यवस्था और उसके लिए ट्रिब्यूनल का गठन, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक क्षेत्र में आरक्षण, बेरोजगारी भत्ते में क्रमिक वृद्धि के अलावा मतदान में सुविधा के लिए ब्रेल में प्रचार चुनाव सामग्री, व्हील चेयर आदि के बंदोबस्त जैसे मुद्दे हैं।
तृतीयपंथी और एलजीबीटी
कुछ वर्ष पहले तृतीयपंथियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आते ही उत्तम सपन सेनापति ने पहला काम किया था वोटर आई कार्ड में अपना जेंडर चेंज करवा ‘अन्य’ श्रेणी में डलवाने के लिए अर्जी डालने का। तब तक तृतीयपंथी चुनाव ‘पुरुष’ या ‘महिला’ श्रेणी के अंतर्गत ही चुनाव लड़ते थे। फैसला आने के बाद उन्हें ओबीसी में आरक्षण तो मिला ही, वोटर आईडी, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस जैसी सुविधाओं का रास्ता भी खुल गया। महाराष्ट्र में तृतीयपंथियों की तादाद एक लाख के ज्यादा बताई जाती है, पर इनमें वोटर बहुत कम हैं।
ज्यादातर तृतीयपंथी गरीब होते हैं और बहुत सारे घर से भागे हुए होने के कारण बेघर। वोटर बनने के लिए जरूरी पात्रता, जैसे आईडी कार्ड और अड्रेस प्रूफ उनके पास होते ही नहीं। पिछले चुनावों में ‘पुरुष’ के रूप में वोट दे चुके जो तृतीयपंथी अब पहचान बदलकर ‘अन्य’ के रूप में वोट देना चाहते हैं तो उनसे पुराने दस्तावेज मांगे जाते हैं, जो पुरुष नाम पर जारी होने के कारण मुमकिन नहीं होता।
बेघरबार
‘एड्रेस के लिए राशन कार्ड लगता है? जब राशन कार्ड ही नहीं है तो वोटर कार्ड कहां से बनेगा? वोट देने से घर मिल जाएगा, क्या? तो फिर वोट देने से फायदा क्या है?’
मीना सोलंकी पूछती हैं। मीना जैसे कई लोग हैं, जिन्होंने आज तक वोट नहीं दिया। वे बेघर जो हैं। ऐसे एक लाख से ज्यादा बेघर मुंबई की गलियों, सड़कों, फुटपाथों और अवैध झोपड़ियों में रहते, छोटे-मोटे काम करके गुजर कर रहे हैं। कुछ वर्ष पहले एक मनपा चुनाव में उन्हें वोट डालने का पहली बार मौका मिला था। पहली बार उनके लिए रजिस्ट्रेशन के लिए ‘रेजिडेंट प्रूफ’ की बाध्यता समाप्त की गई और बूथ लेवल ऑफिसर की इंस्पेक्शन रिपोर्ट के आधार पर मतदान का पात्र मान लिया गया। इन लोगों के लिए बड़े मुद्दे हैं: सरकारी मान्यता, रैन बसेरे कायम करना, शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास की व्यवस्था और पुलिस व सरकारी अमले के ‘शोषण’ से मुक्ति।
भिखारी
वे फुटपाथ पर जिंदगी गुजारते हैं, वोट क्या देंगे! सड़कों और फुटपाथों पर, धार्मिक स्थलों के बाहर, रेल स्टेशनों और बस अड्डों पर-कहां नहीं होते भिखारी! भीख मांगना मुंबई में चोखा धंधा है। यहां भिखारियों की तादाद चार लाख और उनका वार्षिक टर्नओवर ५०० करोड़ रुपए से ज्यादा बताया जाता है। इनके मुद्दे और समस्याएं बेघरों जैसी ही हैं। उनके बड़े मुद्दे हैं: रोजगार और पुनर्वास, अपाहिज व बीमार भिखारियों का इलाज, बेसहारा वृद्ध व महिला भिखारियों के लिए आवास व स्वरोजगार और अनाथ बच्चों के लिए शिक्षा व रोजगार प्रशिक्षण केंद्र।
नाका मजदूर
ताडदेव नाका पर कटिंग चाय पीते हुए ग्राहकों का इंतजार करते ३५ वर्षीय पेंटर सुनील चौहान को २० साल बीत गए, आज तक वोट डालने का मौका नहीं मिला। उनके पास वोटर कार्ड नहीं है। उन्हें वोट डालने की इच्छा और जरूरत भी नहीं है।
ताड़देव ही नहीं, चेंबूर, मुलुंड और सायन जैसे विभिन्न नाकों पर सुनील जैसे हजारों कारपेंटर, राज मिस्त्री, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन और कंस्ट्रक्शन लेबर आपको रोज सुबह ७.३० बजे से १० बजे तक प्राइवेट कस्टमर या कांट्रेक्टर से दिहाड़ी का इंतजार करते दिख जाएंगे। कुशल और अकुशल श्रमिक, जिनमें ज्यादातर बिहार और यूपी से हैं, पर बहुत से महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन करके भी आए हैं। उनके अलावा बड़ी तादाद में घरेलू बाइयां, रिक्शा ड्राइवर, सब्जी और दूध विक्रेता भी हैं। मुंबई की लेबर फोर्स का ७० प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र से है, वे उसी का हिस्सा हैं। कम मजदूरी, काम के लंबे घंटे, आए दिन होने वाले एक्सिडेंट, कोई सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा नहीं, लतें और बीमारियां उनकी नियति हैं। उनके मुद्दे कई चुनावों से जस के तस बने हुए हैं: अधिक मजदूरी, महिला श्रमिकों को भी समान मजदूरी, काम के तय घंटे, शोषण से मुक्ति और आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, बच्चों के शिक्षण, ट्रांजिट वैंâप व आवास सुविधाएं और सुरक्षित कार्यदशा तथा सुरक्षा के उपाय।
सेक्स वर्कर्स
सामाजिक सम्मान व सुरक्षा, रोजगार व पुनर्वास, आवास व मेडिकल सुविधाएं और बच्चों के लिए शिक्षा व प्रशिक्षण सुविधाएं – पिछले चुनावों की तरह आनेवाले मनपा चुनाव में भी सेक्स वर्कर्स के अपने अलग मुद्दे हैं। ‘हम गंदगी, बीमारी व गरीबी में जीवन बिताने को मजबूर हैं, पर हमारी मदद के लिए कोई पार्टी आगे नहीं आती। हर पार्टी महिलाओं की सेफ्टी की बात करती है, पर सेक्स वर्कर्स के उत्थान का फॉर्म्यूला किसी के पास नहीं।’ वोट की चर्चा पर ही पीला हाउस पर ‘धंधा’ करनेवाली बिनीता के जुबान पर कसैला स्वाद छोड़ जाती है। कमाठीपुरा के कोठों में देर से सही, उम्मीदवारों की दस्तकें लगने लगी हैं। ‘पॉलिटिशियन यहां आकर कार से उतरने तक की जहमत नहीं उठाते’, एक सेक्स वर्कर ने दुखड़ा रोया, ‘दूर से ही हाथ हिलाकर चले जाते हैं।’
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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