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तड़का: अस्पताल भरोसा भी बनाएं

कविता श्रीवास्तव

बीमार होने पर सबसे पहले हम डॉक्टर के पास जाते हैं, क्योंकि हमें भरोसा होता है कि वह हमारी जान बचाएंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि इलाज करने वाले डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी खुद सुरक्षित नहीं हैं। अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं और यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में यह गंभीर चिंता का विषय है।
हाल ही में डोंबिवली के मनपा अस्पताल में डॉक्टरों और कर्मचारियों पर हुआ हमला चर्चा का विषय बना। इसके बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने देशभर में डॉक्टरों पर हुए हमलों का डिजिटल रिकॉर्ड जारी करने और मजबूत कानूनी सुरक्षा की मांग दोहराई। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर १० में से ४ स्वास्थ्यकर्मी अपने करियर में शारीरिक हिंसा का शिकार होते ही हैं। यदि गाली-गलौज और धमकियों को भी शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा ६० प्रतिशत से अधिक हो जाता है। भारत में भी लगभग ७७ प्रतिशत डॉक्टर किसी न किसी रूप में हिंसा का सामना कर चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह केवल गुस्सा नहीं, बल्कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियां भी हैं।
सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भारी भीड़, डॉक्टरों और स्टाफ की कमी, घंटों इंतजार, इलाज को लेकर पर्याप्त संवाद का अभाव और तत्काल स्वस्थ होने की उम्मीद अक्सर तनाव पैदा करती है। कई बार इलाज के बावजूद मरीज नहीं बच पाता है तो गुस्सा डॉक्टरों पर निकलता है। इसके लिए कानून बनाने मात्र से समस्या खत्म नहीं होगी। भारत में स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा के लिए कानून तो हैं, लेकिन दोषसिद्धि के मामले बेहद कम हैं। दुनिया के कई देशों ने इस दिशा में अच्छे कदम उठाए हैं। स्पेन ने डॉक्टरों पर हमले को राज्य के विरुद्ध अपराध माना है। सिंगापुर में स्वास्थ्य कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करने पर भारी जुर्माना और जेल का प्रावधान है। ब्रिटेन में हिंसक मरीजों को चिकित्सा सूची से हटाया जा सकता है। इन उपायों से हिंसा के मामलों में कमी देखने को मिली है। भारत में भी सही रणनीति अपनाने की जरूरत है। अस्पतालों में सीसीटीवी, प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी और आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो। डॉक्टरों और मरीजों के परिजनों के बीच बेहतर संवाद हो। मरीजों के परिजनों को समय-समय पर इलाज की स्थिति स्पष्ट रूप से बताई जाए ताकि भ्रम और अफवाहें न पैâलें। स्वास्थ्य बजट बढ़ाकर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और आधुनिक सुविधाओं की संख्या बढ़ाना भी समय की मांग है। साथ ही, स्कूलों, कॉलेजों और मीडिया के माध्यम से यह संदेश दिया जाए कि डॉक्टर ही जीवन बचाने वाले साथी हैं। स्वास्थ्य सेवा विश्वास पर टिकी होती है। इसलिए डॉक्टरों को सुरक्षा मिले और मरीजों के साथ धोखा न हो यह भी जरुरी है। अस्पतालों के बेलगाम चार्ज और इलाज में मनमानी या अनावश्यक ऑपरेशन जैसी घटनाओं के खिलाफ भी सख्त कानून बनना चाहिए। समाज, सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां अस्पताल भी सही इलाज और विश्वास का केंद्र बनें।

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