कविता श्रीवास्तव
१९८३ में वह उंगली क्या उठाr, पूरा भारत रोमांचित हो उठा। खुशियों की लहर पैâल गई। इंग्लैंड में तो शाम हुई थी, लेकिन भारत में मध्यरात्रि का वक्त था, फिर भी पूरे भारत में पटाखे गूंज उठे। भारतीय तिरंगा लहराया गया। तब हम स्कूली बच्चे थे और हमें अच्छे से याद है कि हमने भी बड़े ही अभियान, जोश और उत्साह के साथ विश्व विजेता होने का जश्न मनाया था। क्रिकेट के खेल में सामान्य समझी जानेवाली भारतीय टीम ने सबसे दिग्गज और विश्वविजेता वेस्टइंडीज को परास्त करके १९८३ का क्रिकेट विश्व कप फाइनल मैच जो जीत लिया था। २५ जून, १९८३ को लॉर्ड्स (लंदन) में भारत ने अपना पहला विश्व कप खिताब जीता था। जिस गेंद पर पैâसला हुआ था वह गेंद फेंकी थी भारत के ऑलराउंडर मोहिंदर अमरनाथ ने और माइकल होल्डिंग एलबीडब्ल्यू आउट हुए थे। बैट्समैन के आउट का संकेत देनेवाली वह निर्णायक उंगली उठाने वाले अंपायर थे डिकी बर्ड। क्रिकेट के अब तक के सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित अंपायर डिकी बर्ड ने ९२ वर्ष की आयु में बुधवार को इस जहां को अलविदा कह दिया। यूं तो वे इंग्लैंड के क्रिकेटर थे। बाद में अंपायरिंग को उन्होंने अपना करियर बनाया। उनकी निष्पक्षता और खिलाड़ियों व दर्शकों से जुड़ाव बनाए रखने के स्वभाव ने उन्हें दुनिया का प्रतिष्ठित अंपायर बनाया। भारत से उनका अटूट रिश्ता रहा १९८३ में पहली बार भारत वर्ल्ड कप चैंपियन बना तब अंपायर डिकी ही थे। उन्होंने अपना अंपायरिंग करियर भी भारत और इंग्लैंड के मैच में ही समाप्त किया। वह टेस्ट मैच १९९६ में लॉर्ड्स में खेला गया था। उसी में सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ ने टेस्ट डेब्यू किया था। डिकी बर्ड की आखिरी टेस्ट मैच अंपायरिंग में इंग्लैंड और भारत के खिलाड़ियों ने उनके सम्मान में गार्ड ऑफ ऑनर दिया और पूरा लॉर्ड्स स्टेडियम खड़ा हो गया। हमेशा भावुक रहनेवाले बर्ड की आंखों में तब आंसू आ गए थे। कुल ६६ टेस्ट मैचों और ६९ वनडे इंटरनेशनल में उन्होंने अंपायरिंग की। इनमें तीन वर्ल्डकप शामिल हैं। सात महिला वनडे मुकाबलों में भी बर्ड ने अंपायरिंग की। वे इतने निष्पक्ष और सटीक थे कि वैâमरे की तीसरी आंख भी कभी उन्हें झुठाला नहीं सकी। क्रिकेट मैदानों पर डिकी बर्ड ने दर्शकों को हास्य के क्षण भी दिए। १९ अप्रैल, १९३३ को यॉर्कशायर के बार्न्सले में जन्मे, बर्ड्स अपने समय के एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज थे। उन्होंने यॉर्कशायर और लीसेस्टरशायर के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेला, लेकिन चोट लगने के कारण ३१ वर्ष की आयु में ही उन्होंने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया। उन्होंने एक अंपायर के रूप में सारी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। क्रिकेट अंपायरिंग की जब कभी भी चर्चा होगी, डिकी बर्ड का नाम स्थायी रूप से स्वर्णांकित इतिहास के रूप में चमकता रहेगा।
