तौसीफ कुरैशी
राजनीति में अक्सर यह भ्रम पाल लिया जाता है कि नया मंच, नई तकनीक या नया प्रचार ही जनता का मन जीत लेगा। जबकि सच इससे बिल्कुल उलट है। माध्यम कभी संदेश का विकल्प नहीं बन सकता। हथियार कितना भी आधुनिक क्यों न हो, उसकी ताकत इस बात में नहीं होती कि वह कितना बड़ा है, बल्कि इस बात में होती है कि उसे किस उद्देश्य से चलाया जा रहा है। सोशल मीडिया भी ऐसा ही एक माध्यम है।
इंस्टाग्राम हो, एक्स हो या कोई और मंच यदि सरकार के पास युवाओं के भविष्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विश्वास को लेकर ठोस दृष्टि नहीं है, तो सबसे आधुनिक प्लेटफॉर्म भी केवल शोर पैदा करेगा, संवाद नहीं। जनता प्रचार से अधिक नीति को पहचानती है। वह भाषण नहीं, अपने जीवन में आए बदलाव को याद रखती है। इतिहास इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। महात्मा गांधी के पास न वैâमरे थे, न डिजिटल मंच। वे चिट्ठियां लिखते थे और वे चिट्ठियां साम्राज्य की नींव हिला देती थीं। भगत सिंह का फांसी से पहले लिखा गया अंतिम पत्र आज भी युवाओं के मन में साहस और स्वतंत्रता की लौ जलाता है। उन शब्दों की शक्ति किसी तकनीक से नहीं, उनके सत्य और उद्देश्य से आती है। यही कारण है कि जब हजारों छात्र अपने भविष्य की चिंता लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो उनकी आवाज किसी एल्गोरिद्म की मोहताज नहीं होती। यदि उनकी पीड़ा वास्तविक है, तो वह बिना किसी प्रचार के भी समाज तक पहुंच जाती है। और यदि सत्ता के पास उस पीड़ा का उत्तर नहीं है, तो सबसे चमकदार डिजिटल अभियान भी उपहास का विषय बन सकता है।
लोकतंत्र में सरकार के लिए अवसर हमेशा समाप्त नहीं होते। आज भी यदि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार हो, भर्ती प्रक्रियाएं पारदर्शी और समयबद्ध बनें, बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिले, समाज को बांटने वाली राजनीति की जगह विश्वास का वातावरण बने और असहमति को अपराध मानने की प्रवृत्ति समाप्त हो, तो उसका असर किसी प्रचार अभियान से कहीं अधिक होगा। जनता अंतत: शब्दों से नहीं, कर्मों से प्रभावित होती है। इतिहास गवाह है कि सच्ची बात किसी भी माध्यम से अपना रास्ता बना लेती है और खोखला संदेश, चाहे वह कितने ही आधुनिक मंच से क्यों न दिया जाए, अंतत: शोर बनकर रह जाता है। यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा सत्य है। लेकिन यह बात नाथूराम गोडसे के अनुयायियों की समझ में नहीं आ सकती। यह तो गांधीवादियों की पहचान है।
सत्यमेव जयते
