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७५ प्रतिशत नियम का खेल…राज्य में १७ सीटों पर होगा चुनाव!.. सत्ता समीकरण में बड़ा उलटफेर तय

सुनील ओसवाल / मुंबई

महाराष्ट्र की राजनीति में ठहराव खत्म होने के संकेत साफ हैं। स्थानीय स्वराज्य संस्था कोटे से विधान परिषद की १७ सीटों पर लंबे समय से अटका चुनाव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। वजह बना है एक तकनीकी लेकिन बेहद असरदार नियम-७५ प्रतिशत मतदाता की उपलब्धता-जिसने सियासी तस्वीर ही बदल दी है।
बीते तीन साल से स्थानीय निकाय चुनाव न होने के कारण ये सीटें एक-एक कर खाली होती गर्इं। ओबीसी आरक्षण के विवाद ने प्रक्रिया को और उलझाया, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। पिछले छह महीनों में राज्य के कई हिस्सों में नगरपंचायत, नगरपालिका, महापालिका और १२ जिलों में जिला परिषद-पंचायत समिति चुनाव पूरे हो चुके हैं, जिससे चुनावी ढांचा फिर सक्रिय हुआ है।
चुनाव आयोग के सूत्रों के मुताबिक, भले ही २० जिलों में जिला परिषद चुनाव अभी बाकी हैं, लेकिन इससे विधान परिषद चुनाव पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। कारण साफ है-जहां ७५ प्रतिशत से ज्यादा मतदाता उपलब्ध हैं, वहां चुनाव कराए जा सकते हैं। यही नियम अब सियासत का गेमचेंजर बन गया है। पुणे, सोलापुर, सांगली-सातारा और रायगड-रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग में १०० प्रतिशत मतदाता मौजूद हैं, वहीं बाकी जिलों में भी नगरपालिका और महापालिका स्तर के प्रतिनिधियों के कारण ७५ प्रतिशत का आंकड़ा आसानी से पार हो रहा है। यानी चुनावी रास्ता लगभग पूरी तरह साफ है।
अंदरखाने हलचल तेज है। राजनीतिक दलों ने संभावित उम्मीदवारों पर मंथन शुरू कर दिया है। गठजोड़, समीकरण और रणनीति सब कुछ फिर से तय किया जा रहा है। क्योंकि ये सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन की नई बिसात है। चुनाव आयोग ने जिलावार मतदाता सूची मंगवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जैसे ही सूची अंतिम रूप लेगी, चुनाव कार्यक्रम घोषित होने की संभावना है। सूत्र बताते हैं कि तीन से छह महीनों के भीतर चुनाव हो सकते हैं, जिससे राज्य में सियासी तापमान अचानक बढ़ेगा। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में एक संवेदनशील पहलू भी है। जिन जिलों में जिला परिषद चुनाव नहीं हुए, वहां के सदस्य मतदान से बाहर रह सकते हैं। इससे राजनीतिक असंतोष और विवाद की नई जमीन भी तैयार हो सकती है।

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