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बागियों से डरी भाजपा का नया चुनावी चूरन … जिन्हें टिकट नहीं मिला उन्हें बनाएंगे मनोनीत नगरसेवक!

बदलेगा नियम, एक साल का होगा कार्यकाल
सामना सांवददाता / मुंबई
राज्य में जारी स्थानीय निकायों के चुनावों ने महायुति के राजनीतिक दलों की अंदरूनी कलह को बेनकाब कर दिया है। वर्षों तक पार्टी के लिए पसीना बहाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं को टिकट से वंचित किए जाने के बाद मुंबई, पुणे, नागपुर, छत्रपति संभाजीनगर और कोल्हापुर जैसे बड़े शहरों में जबरदस्त बगावत देखने को मिली। हालात इतने बिगड़े कि इन बागियों को शांत करने में भाजपा और शिंदे गुट को खासी मशक्कत करनी पड़ी। चुनाव में बागियों से भाजपा को जोर का झटका लगा है। बागी भाजपा का खेल बिगाड़ सकते हैं। ऐसे में बागियों से डरी भाजपा ने अब नया चूरन देते हुए नाराज लोगों को मनोनीत नगरसेवक बनाने का मन बनाया है। लेकिन ज्यादा लोगों को समाहित करने के लिए नियम में बदलाव कर स्वीकृत नगरसेवकों के टर्म एक साल करने का निर्णय पर विचार चल रहा है।
बता दें कि बगावत के इस राजनीतिक भूचाल का सबसे बड़ा झटका भाजपा को लगा है। भाजपा में नाराजगी के पीछे तीन बड़े कारण सामने आए हैं। स्थानीय निकायों के चुनाव का वर्षों तक टाला जाना, चुनाव के मुहाने पर थोक में पार्टी प्रवेश, पार्टी में आते ही उम्मीदवारी थमा देना, जबकि पुराने कार्यकर्ताओं के हाथ में झंडा और दरी बिछाने का काम दिया गया है। इसी कारण भाजपा के परंपरागत निष्ठावान कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष पनप गया है। कार्यकर्ताओं के बगावत की आग को ठंडा करने के लिए भाजपा ने अब नया चुनावी फॉर्मूला निकाला है।
रक्षात्मक मुद्रा में पार्टी
चुनाव के दौरान बागियों को मनाने के लिए नेताओं ने बड़े पैमाने पर ‘मनोनीत (स्वीकृत) नगरसेवक’ बनाने का वादा किया था। अब उसी वादे को अमल में लाने की तैयारी तेज हो गई है। बागियों के डर ने भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है, लेकिन सवाल उठने लगे हैं कि क्या बगावत के डर से भाजपा पिछले दरवाजे से सत्ता का रास्ता खोल रही है?

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