मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात: बारिश, बंदिश और बगावत!

अंदर की बात: बारिश, बंदिश और बगावत!

राजन पारकर

मुंबई से दिल्ली तक सत्ता के गलियारों में बढ़ी बेचैनी

मुंबई में धारा १४४ को लेकर फैली अफवाहों ने प्रशासन की सूचना व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के बीच मनोज जरांगे पाटील की हुंकार ने सत्ता के कान खड़े कर दिए हैं। दूसरी ओर शिवसेना के छह बागी सांसदों को सुप्रीम कोर्ट की नोटिस ने राजनीतिक समीकरणों में नई हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में कई बड़े चेहरे असहज स्थिति में दिखाई दे सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय, पुलिस मुख्यालय और विभिन्न दलों के बंद कमरों में लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। असली चिंता जनता की नहीं, बल्कि अपनी-अपनी कुर्सियों और राजनीतिक भविष्य की बताई जा रही है।
धारा १४४ और स्कूल की छुट्टी, अफवाहों का ‘महामेला’ किसने लगाया?
मुंबई में बारिश से ज्यादा बाढ़ अफवाहों की आई। सोशल मीडिया ने एक झूठ उछाला और पूरा शहर छुट्टी के इंतजार में बैठ गया। आखिरकार बीएमसी को सफाई देनी पड़ी कि स्कूल बंद नहीं होंगे। सवाल यह है कि अगर प्रशासन की सूचना व्यवस्था इतनी मजबूत है तो फिर अफवाहों को इतना बड़ा मंच किसने दिया? ‘सरकार का सूचना तंत्र इतना तेज है कि सच पहुंचते-पहुंचते झूठ का विजय जुलूस निकल जाता है।’ राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि प्रशासन अब केवल आदेश जारी करने तक सीमित हो गया है, जनता तक सही जानकारी पहुंचाना उसकी प्राथमिकता नहीं रह गई। सूत्रों के अनुसार, पुलिस और मनपा के बीच समन्वय को लेकर भी अंदरखाने सवाल उठ रहे हैं। धारा १४४ लागू हुई, लेकिन स्कूल खुले रहे। इसका अर्थ साफ है कि कानून-व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था अलग-अलग विषय हैं। फिर भी जनता भ्रमित हुई। इसका जिम्मेदार कौन? कोई जवाब देने को तैयार नहीं। चर्चा है कि मंत्रालय में इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा होगी और कुछ अधिकारियों से स्पष्टीकरण भी मांगा जा सकता है। क्योंकि अफवाहें केवल भ्रम नहीं पैâलातीं, वे प्रशासन की विश्वसनीयता भी कमजोर करती हैं।
जरांगे की हुंकार, सत्ता के सिंहासन तक पहुंची चेतावनी
दिल्ली के जंतर-मंतर से मनोज जरांगे पाटील ने जो संदेश दिया, वह केवल छात्रों के समर्थन का भाषण नहीं था, बल्कि सत्ता को खुली राजनीतिक चेतावनी भी थी। उन्होंने साफ कहा कि अगर छात्रों को धक्का लगा तो पूरा समाज उनके साथ खड़ा होगा। राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह बयान आने वाले चुनावों की दिशा तय करने वाला संकेत भी हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, महाराष्ट्र की सत्ता में बैठे कई नेताओं ने इस बयान को बेहद गंभीरता से लिया है। चर्चा है कि मराठा आरक्षण और छात्र असंतोष का मुद्दा यदि एक साथ जुड़ गया तो सरकार की मुश्किलें कई गुना बढ़ सकती हैं। ‘जनता जब तक वोट देती है तब तक उसे ‘जनार्दन’ कहा जाता है, लेकिन सवाल पूछते ही वही जनता व्यवस्था की आंखों की किरकिरी बन जाती है।’ राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कुछ मंत्री अब अपने-अपने क्षेत्रों में नुकसान की भरपाई के लिए सक्रिय हो गए हैं। कौन नाराज है, किसका टिकट कट सकता है और किस मंत्री की कुर्सी हिल सकती है, इस पर बंद कमरों में लगातार मंथन जारी बताया जा रहा है।
छह बागी सांसदों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस अब किसकी धड़कन तेज?
स त्ता की राजनीति में दल बदलना आज भले सामान्य बात बन गई हो, लेकिन अदालत का दरवाजा खुलते ही राजनीतिक आत्मविश्वास का रंग उड़ जाता है। शिवसेना के छह बागी सांसदों को सुप्रीम कोर्ट के नोटिस ने यही संदेश दिया है कि लोकतंत्र में अंतिम पैâसला अदालत भी करती है। अब दो सप्ताह में जवाब देना होगा और पूरे मामले पर सबकी नजर रहेगी। सूत्रों के अनुसार, इस नोटिस के बाद कई राजनीतिक रणनीतिकारों की बैठकों का दौर शुरू हो गया है। चर्चा है कि यदि न्यायालय की टिप्पणी प्रतिकूल रही तो इसका असर केवल छह सांसदों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई अन्य राजनीतिक समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं। ‘सत्ता के गलियारों में वफादारी अब विचारधारा से नहीं, अवसर की घड़ी से तय होती है। लेकिन अदालत की घड़ी अवसर नहीं, कानून देखती है।’ राजनीतिक कानाफूसी यह भी है कि आने वाले समय में कुछ और नेताओं की राजनीतिक दिशा बदल सकती है। कौन किस खेमे में जाएगा और किसकी कुर्सी डगमगाएगी, इसका फैसला केवल राजनीतिक जोड़-तोड़ नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी तय करेगी। मुंबई में अफवाहों का मौसम है, दिल्ली में आंदोलनों का तापमान है और अदालतों में राजनीति की परीक्षा चल रही है। जनता आज भी जवाब चाहती है, लेकिन सत्ता के गलियारों में जवाब कम और रणनीति ज्यादा तैयार हो रही है।

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