धीरज फूलमती सिंह, मुंबई
हममें से बहुत से लोगों को लगता है कि प्रकृति ने गाय और भैंस को इंसानों को दूध देने के लिए बनाया है, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, दूध सभी स्तनधारी जीवों की मादाओं के लिए अपनी संतानों को पोषण देने का प्राकृतिक माध्यम है। गाय और भैंस का दूध भी मूल रूप से उनके बच्चों के लिए ही होता है।
गाय का जंगली पूर्वज ऑरॉक्स था, जबकि घरेलू भैंस का संबंध जंगली जल भैंसों से माना जाता है। इन जंगली पशुओं में दूध उत्पादन उनकी संतानों की जरूरतों के अनुरूप होता था। बछड़ा या बच्चा बड़ा होकर घास और अन्य प्राकृतिक आहार खाने लगता, तो धीरे-धीरे दूध पीने पर उसकी निर्भरता कम हो जाती थी।
दूध पचाने की क्षमता कैसे विकसित हुई?
हजारों साल पहले तक अधिकांश मनुष्यों में बचपन के बाद दूध में मौजूद लैक्टोज को पचाने की क्षमता कम हो जाती थी। इसका कारण लैक्टेज नामक एंजाइम का उत्पादन कम होना था। यह एंजाइम दूध की शर्करा लैक्टोज को पचाने में मदद करता है। इसकी कमी होने पर दूध पीने से पेट फूलना, गैस, पेट दर्द और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि, दूध न पचा पाने से हर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी, यह दावा गलत है।
जब मनुष्य ने पशुपालन शुरू किया और गाय-भैंस का दूध अपने आहार में शामिल किया, तो कुछ आबादी में आनुवंशिक बदलावों के कारण वयस्क अवस्था में भी लैक्टेज एंजाइम बनता रहा। इस विशेषता को लैक्टेज पर्सिस्टेंस कहा जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह गुण उन समुदायों में अधिक आम हुआ, जहां दूध का सेवन जीवनशैली और खानपान का हिस्सा बन गया।
पशुपालन ने बदल दी दूध की दुनिया
मनुष्य ने हजारों वर्षों तक चयनात्मक प्रजनन के माध्यम से गायों और भैंसों की नस्लों में सुधार किया। जिन पशुओं में दूध उत्पादन अधिक था, उन्हें प्रजनन के लिए प्राथमिकता दी गई। बेहतर आहार, देखभाल और पशुपालन की आधुनिक तकनीकों ने भी दूध उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
इसी लंबी प्रक्रिया का परिणाम है कि आज कई नस्लों की गायें और भैंसें अपने जंगली पूर्वजों की तुलना में कहीं अधिक दूध देती हैं। हालांकि, दूध उत्पादन नस्ल, आहार, स्वास्थ्य और देखभाल पर निर्भर करता है। इस तरह दूध की कहानी केवल भोजन की नहीं, बल्कि प्रकृति, आनुवंशिकी और मनुष्य के हजारों वर्षों के सह-अस्तित्व की कहानी भी है।
