मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: मौन कौन? पीएम या मीडिया?

रुख-ए-सियासत: मौन कौन? पीएम या मीडिया?

तौसीफ कुरैशी

-जब प्रहरी ही सत्ता का प्रवक्ता बन जाए, तब सवाल मरने लगते हैं और चुप्पी को राष्ट्रभक्ति का नाम दे दिया जाता है। विडंबना देखिए, जिसे बोलने वाला बताया गया, उसके मौन पर सवाल नहीं हैं।

-सम्मान केवल मुआवजे से नहीं मिलता, सम्मान सत्य को स्वीकार करने से मिलता है। लोकतंत्र में सरकारें गलती कर सकती हैं। लेकिन गलती से भी बड़ा अपराध है, उसे स्वीकार न करना।

लोकतंत्र में मौन हमेशा शब्दों की कमी नहीं होता, कई बार वह सच की हत्या का सबसे परिष्कृत तरीका होता है। आज जब देश की राजनीति में `मौन’ शब्द फिर उछाला जा रहा है, तो जरा पीछे मुड़कर देखने की जरूरत है।
याद कीजिए, २०११ से २०१४ तक का वह दौर। देश का शायद ही कोई अखबार, कोई टीवी चैनल या कोई राजनीतिक मंच बचा हो जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को `मौन प्रधानमंत्री’ न कहा गया हो। यह विशेषण इतना दोहराया गया कि मानो वह कोई तथ्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सत्य बन गया हो। जबकि हकीकत यह थी कि डॉ़ मनमोहन सिंह संसद में बोलते थे, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे, विदेश नीति पर अपनी बात रखते थे और हर बड़े अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर भारत का पक्ष सामने रखते थे। असहमति हो सकती है, आलोचना हो सकती है, लेकिन यह कहना कि वे बोलते ही नहीं थे, एक राजनीतिक आख्यान था, जिसे एक षड्यंत्र के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिलकर मीडिया ने सत्य की तरह बेच दिया और मूर्खों ने उसे बिकने दिया। उसके बाद मूर्खों ने ही देश के लिए एक ऐसा प्रधानमंत्री चुना, जिसके बारे में कहा गया कि वह बहुत बोलता है हर विषय बोलता है। सचमुच, वह बोलता भी है। चुनावी सभाओं में, रेडियो पर, विदेश यात्राओं में, सोशल मीडिया पर। कभी मंगलसूत्र पर, कभी श्मशान-कब्रिस्तान पर, कभी नाले की गैस से चाय बनाने पर, कभी पकोड़ों में रोजगार खोजने पर। विषयों की कोई कमी नहीं भैंस चोरी कर ले जाएंगे तरह-तरह ऊल-जलूल जिनका कोई मतलब नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जब अमेरिका के हमले में भारतीय नागरिक मारे जाते हैं, तब आवाज कहां चली जाती है? जब कोई विदेशी नेता भारत को `नरककुंड’ जैसी अपमानजनक उपमा देता है, तब शब्दों का वह अथाह भंडार अचानक सूख क्यों जाता है? जब कोई विदेशी शासक यह संकेत देता है कि वह भारतीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है, तब राष्ट्रसम्मान की वह आग कहां चली जाती है, जो चुनावी मंचों पर धधकती दिखाई देती है?

इन सवालों का उत्तर शायद प्रधानमंत्री से भी पहले मीडिया को देना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया केवल सूचना देने वाला माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने वाला प्रहरी होता है। लेकिन जब प्रहरी ही सत्ता का प्रवक्ता बन जाए, तब सवाल मरने लगते हैं और चुप्पी को राष्ट्रभक्ति का नाम दे दिया जाता है। विडंबना देखिए, जिसे बोलने वाला बताया गया, उसके मौन पर सवाल नहीं हैं। जिसे मौन बताया गया, उसकी हर बात में खामियां खोजी गईं। इसलिए आज असली प्रश्न यह नहीं है कि प्रधानमंत्री मौन हैं या नहीं। असली प्रश्न यह है कि मीडिया मौन क्यों है? शायद समय आ गया है कि `मौन प्रधानमंत्री’ का पुराना तमगा संग्रहालय में रख दिया जाए और उसकी जगह एक नया नाम लिखा जाए `मौन मीडिया’। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की चुप्पी से अधिक खतरनाक, सवालों की चुप्पी होती है।
सत्यमेव जयते

शहादत का सच और सत्ता की चुप्पी
शहादत केवल एक सैनिक की मृत्यु नहीं होती, वह एक परिवार का आजीवन गर्व, एक राष्ट्र का नैतिक दायित्व और लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा होती है। किसी सैनिक के पार्थिव शरीर पर तिरंगा इसलिए नहीं ओढ़ाया जाता कि कुछ महीनों बाद उसकी शहादत पर बहस होने लगे या उसे स्वीकार करने में हिचक दिखाई जाए। सवाल बहुत सीधा है। यदि किसी शहीद के परिवार को एक वर्ष तक यह महसूस कराया जाए कि उनके बेटे, पति या पिता की शहादत पर सरकार स्पष्ट नहीं है, तो क्या उनके मन में वही गर्व बचा रहेगा, जो अंतिम विदाई के समय था?
सम्मान केवल मुआवजे से नहीं मिलता, सम्मान सत्य को स्वीकार करने से मिलता है। लोकतंत्र में सरकारें गलती कर सकती हैं। लेकिन गलती से भी बड़ा अपराध है, उसे स्वीकार न करना। यदि किसी आधिकारिक सूची से पहले अलग दावा किया गया था और बाद में स्थिति बदली, तो पत्रकारिता का पहला धर्म यही था कि वह जनता को पूरा संदर्भ बताती। खबर केवल यह नहीं होती कि सूची जारी हुई, खबर यह भी होती है कि पहले क्या कहा गया था और अब क्या बदला है। यही पत्रकारिता है, यही जनता के प्रति जवाबदेही है। दुर्भाग्य यह है कि आज सत्ता और समाचार के बीच की दूरी लगातार कम होती दिखाई देती है। सवाल पूछने की जगह सरकार की तरफ से सफाई देने की होड़ लगी है। सत्ता से असहमति को राष्ट्र-विरोध और सत्ता के समर्थन को राष्ट्रवाद मान लेने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। राष्ट्र सरकार से बड़ा होता है, लेकिन आज सरकार को बड़ा किया जा रहा है और सैनिक किसी दल का नहीं, पूरे देश का होता है। याद आता है कि कभी पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना माना जाता था, सत्ता के लिए सवालों का जवाब गढ़ना नहीं। यदि किसी दूसरे राजनीतिक दौर में ऐसा विरोधाभास सामने आता, तो संभव है कि सुर्खियां कहीं अधिक तीखी होतीं। इसलिए प्रश्न सरकार से जितना है, उतना ही मीडिया से भी है। क्या पत्रकार का दायित्व सत्ता के कथन को जस का तस दोहराना है या तथ्यों की परतें खोलना? शहीदों की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि भाषण नहीं, सत्य है। सैनिक सीमा पर यह सोचकर प्राण नहीं देता कि उसकी शहादत भी राजनीतिक सुविधा के तराजू पर तौली जाएगी। वह इसलिए बलिदान देता है कि देश उसके पीछे सच के साथ खड़ा रहेगा। राष्ट्रवाद का अर्थ केवल नारों की ऊंची आवाज नहीं है। राष्ट्रवाद का अर्थ है शहीद का सम्मान, उसके परिवार के दर्द की संवेदना और सत्ता से यह पूछने का साहस कि सच क्या है। क्योंकि जब शहादत पर भी सच बोलना कठिन हो जाए, तब सबसे बड़ा संकट सीमा पर नहीं, लोकतंत्र की आत्मा पर होता है।

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