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पुलिस व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत मोदी राज में अदालती आदेश की हो रही अवहेलना!

-१९९६ में दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने १० सालों बाद दिया था फैसला
-अब १९ सालों से लटका है दूसरा मामला

भारतीय पुलिस में तत्काल सुधार करने संबंधी अदालती आदेश की पिछले करीब दो दशकों से केंद्र व राज्य सरकारों की तरफ से अवहेलना हो रही है। १९९६ में दायर की गई याचिका पर करीब १० साल बाद पैâसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने २००६ में आदेश पारित किया था, लेकिन विभिन्न कारणों से इस मामले को पिछले १९ सालों से लटकाए रखा गया है।
बता दें कि १९९६ में दायर जनहित याचिका में कहा गया कि कार्यपालिका अपने स्वार्थी, पक्षपाती और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कानून का पालन करने वाली एजेंसी का दुरुपयोग करती है, जिससे मानवाधिकारों पर हमले बढ़े हैं। पुलिस को देश के कानून और देश की जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। मामले पर १० साल की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने २००६ में वंâेद्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे पुलिस को बाहरी दबावों से मुक्त रखने के लिए प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन करे, विभाग के अधिकारियों को ट्रांसफर पोस्टिंग मामलों में कुछ स्वायत्तता देने के लिए एक ‘पुलिस स्थापना बोर्ड’ और पुलिसकर्मियों के खिलाफ गंभीर दुराचरण की शिकायत की जांच के लिए एक ‘शिकायत प्राधिकरण’ का गठन करे। ताकि इस सर्वोच्च पद के लिए सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों के नामों पर ही विचार हो, मैदानी कार्यों से जुड़े अधिकारियों को दो साल की निश्चित कार्य अवधि दी जाए और महानगरों में जांच-पड़ताल के काम को कानून-व्यवस्था को लागू करवाने के काम से अलग किया जाए। केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन करने का निर्देश दिया गया, ताकि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को और प्रभावी बनाते हुए उसके कर्मचारियों की सेवा शर्तों को सुधारा जा सके।
जस्टिस थॉमस कमेटी का गठन
२००८ में जस्टिस थॉमस कमेटी का गठन यह पता लगाने के लिए किया गया था कि राज्यों ने निर्देशों को लागू किया है या नहीं। कमेटी ने कोर्ट के २००६ के निर्देशों को लागू करने में राज्यों की ‘पूर्ण अनदेखी’ पर विस्मय जाहिर किया।

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