मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : लेनिन की मूर्ति से डर क्यों?

विजय-विमर्श : लेनिन की मूर्ति से डर क्यों?

विजयशंकर चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद मुर्शिदाबाद के जियागंज में व्लादिमीर इलीइच लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया गया। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले त्रिपुरा में जब माणिक सरकार की वामपंथी सरकार सत्ता से बाहर हुई और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तब भी लेनिन की मूर्ति गिरा दी गई थी।
हर बार एक ही पैटर्न सामने आता है- सत्ता बदलते ही पहले मूर्तियां तोड़ी जाती हैं, फिर दफ्तर जलाए जाते हैं, फिर विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमले होते हैं और अंतत: लोकतंत्र का सार्वजनिक अपमान सामान्य बना दिया जाता है।
यह केवल राजनीतिक प्रतिशोध नहीं है, बल्कि गहरी सांस्कृतिक असुरक्षा और वैचारिक दिवालियापन का प्रदर्शन है। जिनके पास इतिहास में जोड़ने के लिए कुछ नहीं होता, वे इतिहास को तोड़ने लगते हैं। जिन्हें अपने विचारों की ताकत पर भरोसा नहीं होता, वे प्रतिमाओं पर हथौड़े चलाते हैं।
लेनिन और भारत का ऐतिहासिक रिश्ता
कुछ लोग पूछते हैं कि भारत में लेनिन की मूर्ति क्यों? यह प्रश्न उसी उन्माद से पैदा होता है, जिसका इतिहास से कोई संबंध नहीं। व्लादिमीर इलीइच लेनिन उन शुरुआती वैश्विक नेताओं में थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई का खुलकर समर्थन किया।
बंगाल में १९०० के दौरान छाए भीषण अकाल में उन्होंने ब्रिटिश सरकार की अमानवीय नीतियों की तीखी आलोचना की थी। भारत के राष्ट्रवादी नेताओं की ही तरह १९०५ के बंग-भंग का उन्होंने लिखकर विरोध किया। १९१९ के जलियांवाला बाग नरसंहार को उन्होंने साम्राज्यवादी बर्बरता कहा। बाल गंगाधर तिलक को मांडले जेल भेजे जाने पर लेनिन ने ब्रिटिश शासन को ‘गीदड़ों की सत्ता’ बताया था।
१९२० में उन्होंने महात्मा गांधी को भारत के जनआंदोलन का प्रेरक नेता कहा। भारतीय क्रांतिकारी एम.एन. रॉय, राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना बरकतुल्ला जैसे लोग उनसे मिले थे। भारत के अनेक स्वतंत्रता सेनानी और बुद्धिजीवी-जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, रवींद्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद-रूसी क्रांति और लेनिन के विचारों से प्रभावित थे।
इतिहास गवाह है कि फांसी से पहले भगत सिंह लेनिन पर पुस्तक पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा था, ‘रुकिए, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’
इतिहास को मिटाने की उन्मादी बेचैनी
अमर शहीद भगत सिंह ने लेनिन दिवस पर भेजे गए एक संदेश में कहा था, ‘हम महान लेनिन के विचारों को आगे बढ़ानेवाले सभी लोगों को हार्दिक अभिवादन भेजते हैं। हम रूस के महान प्रयोग की सफलता चाहते हैं। हम अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक वर्ग आंदोलन की आवाज में अपनी आवाज मिलाते हैं। पूंजीवाद पराजित होगा। साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।’ और जवाहरलाल नेहरू ने लिखा था, ‘लेनिन की महान अक्टूबर क्रांति के समय हमने भारत में स्वतंत्रता संग्राम का नया चरण शुरू किया, लेनिन का उदाहरण हमें बहुत प्रभावित करता रहा।’
लेनिन स्वयं भारत के बारे में लिखते थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी ‘सबसे सभ्य यूरोपीय राजनेता भी भारत पर शासन करते समय असली चंगेज खान बन जाते हैं।’
दुनियाभर में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर की मूर्तियां लगी हुई हैं। मास्को में भी इनकी प्रतिमाएं सम्मान के साथ स्थापित हैं। यदि हर देश केवल अपने विचार से मेल खाने वाले व्यक्तियों को ही स्वीकार करने लगे तो पूरी दुनिया स्मृतियों का युद्धक्षेत्र बन जाएगी।
मूर्ति गिराना किसी विचार को समाप्त नहीं करता। यह केवल यह साबित करता है कि गिरानेवालों के भीतर विचार से संवाद करने की क्षमता समाप्त हो चुकी है।
इतिहास और विचार हथौड़ों से नहीं हारता
समस्या केवल मूर्तियां गिराने तक सीमित नहीं है। बंगाल में चुनाव परिणाम आने के बाद विपक्षी दलों के दफ्तर जलाए गए, कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं, महिलाओं तक को प्रताड़ित किया गया। यह दिखाता है कि वैचारिक असहमति को राजनीतिक दुश्मनी में बदल दिया गया है। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक संस्कार के पतन का संकेत है।
सभ्य समाज अपने विरोधियों की मूर्तियां नहीं गिराता, उनके विचारों से बहस करता है। जो समाज अपनी स्मृतियों से डरने लगता है, वह अंतत: अपने भविष्य से भी डरने लगता है।
लेनिन की मूर्ति टूट सकती है, लेकिन यह तथ्य नहीं टूटेगा कि उन्होंने भारत की आजादी का समर्थन किया था। इतिहास की सबसे बड़ी ताकत यही है, वह उन्माद से क्षणभर के लिए घायल हो सकता है, लेकिन पराजित कभी नहीं होता।
मूर्तियां गिराकर इतिहास नहीं बदला जा सकता। उल्टा, यह गिराने वालों की संकीर्णता और भय को ही उजागर करता है। सच्चा लोकतंत्र तब आएगा, जब हम प्रतिमाओं के साथ-साथ विचारों का भी सम्मान करना सीखेंगे। विरोधी विचारों से जीतना ही है तो हथौड़े नहीं, बहस और तर्क से काम लीजिए।

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