मनमोहन सिंह
अमावस्या की वह काली रात्रि थी। श्मशान की भयानक नीरवता में केवल गिद्धों के पंखों की फड़फड़ाहट सुनाई दे रही थी। राजा विक्रम ने उस झुलसे हुए शव को वृक्ष से उतारा उसे अपने कंधे पर लादा और मौन धारण कर आगे बढ़ने लगे, तभी शव के भीतर से बेताल का अट्टहास गूंजा। `राजन! तेरी यह निष्ठा देखकर विधाता भी विस्मित हो जाएं। पर यह मार्ग लंबा और पथरीला है। चल तेरी थकान मिटाने के लिए मैं तुझे एक भविष्य-कथा सुनाता हूं। तेरे लिए कहानी एक सीख होगी..! ध्यान से सुनना, क्योंकि यदि अंत में तूने निष्पक्ष न्याय नहीं किया तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।’
कथा: मायावी यंत्र और दिग्भ्रमित जनतंत्र!
बेताल बोला, `हे नृपश्रेष्ठ! काल के चक्र में एक ऐसा समय आएगा, जब आर्यावर्त के पूर्व और पूर्वोत्तर के प्रांतों में शासन की एक विचित्र बिसात बिछेगी। कहने को तो वहां प्रजा का मत सर्वोपरि होगा, पर सत्ता के गलियारों में ऐसी यंत्रणा विकसित की जाएगी, जो केवल सत्ताधीश की उंगलियों पर नाचेगी।’
`वहां के शासक जो स्वयं को न्याय का पर्याय कहेंगे साम-दाम-दंड-भेद की मर्यादाएं लांघ देंगे। वे एक ऐसे मायावी अस्त्र का प्रयोग करेंगे, जो अदृश्य रूप से जनमत की दिशा बदल देगा। प्रजा अपनी आंखों से देखेगी कि उनके मत वैसे ही लुप्त हो रहे हैं, जैसे आंखों के सामने हाथ की सफाई दिखाई जाती है। उस देश का निर्वाचन प्रहरी अपनी मर्यादा भूलकर मौन हो जाएगा और न्याय का मंदिर भी समय की प्रतीक्षा करने लगेगा। वहां एक युवा सारथी होगा, जिसके साथ उसके निष्ठावान मित्रों और सहयोगियों की टोली भी होगी। वे बार-बार शंखनाद करेंगे कि शासन की जड़ें खोखली हो चुकी हैं और सत्य को बंधक बना लिया गया है। पर राजन विडंबना देख! जब रणभेरी बजेगी तो विपक्षी दलों के सेनापति अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग अलापेंगे। उन्हें सामने खड़ा बड़ा संकट दिखाई ही नहीं देगा। उन्हें घर के भेदी का पता नहीं होगा… और उन्हें भेदी का पता चल भी जाएगा तो वे कुछ भी करने में असमर्थ होंगे!’ `फिर समय का चक्र इतनी तेजी से घूमा कि शक्तिशाली धनपतियों के साथ मिलकर सत्ताधीश ने पूरे रणक्षेत्र को अपनी जागीर बना लिया। विपक्षी दल अपने अहम की नींद में डूबे रहे और जब बाजी हाथ से निकल गई, तब उन्हें एकता का स्मरण हुआ।’
बेताल का तीखा कटाक्ष और प्रश्न
बेताल ने जलते स्वर में कहा, `राजन! क्या वे विपक्षी दल और वह युवा सारथी उस आत्म-मंथन के लिए तैयार हैं, जिससे विष और अमृत दोनों निकलते हैं? क्या उनमें इतना साहस है कि वे अपनी गलतियों के दर्पण में अपना चेहरा देख सकें? या फिर वे इसी भ्रम में रहेंगे कि जनता स्वयं जाग जाएगी?’ `स्मरण कर उपनिषद क्या कहता है? उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत अर्थात उठो जागो और श्रेष्ठता को प्राप्त करो। यदि वे आज नहीं जागे और अपनी नई भूमिकाओं के बारे में नहीं सोचा तो आने वाली पीढ़ियां उनके इस बिखराव पर क्या सोचेगी? क्या वे यह कहेंगी कि जब लोकतंत्र की नाव डगमगा रही थी, तब मांझी किनारा खोजने के बजाय आपस में ही उलझ रहे थे?’ `अब बता विक्रम! यदि शासन का तंत्र अन्यायी हो जाए और विपक्ष के आपसी कलह के चलते जनतंत्र की बलि चढ़ जाए तो इस विनाश का उत्तरदायी कौन है? क्या वह चतुर सत्ताधीश वह मौन प्रहरी या वह दिशाहीन विपक्ष? या प्रजा? और क्या उस युवा सारथी और उसके मित्रों की यह सामूहिक विफलता नहीं है? बोल राजन यदि तूने न्याय नहीं किया तो तेरा पुण्य क्षीण होगा।
विक्रम का न्यायपूर्ण उत्तर
राजा विक्रम रुके और अडिग स्वर में बोले, `हे बेताल! प्राचीन सूक्ति है सह नाववतु सह नौ भुनक्तु अर्थात हम साथ चलें, साथ रक्षा करें। मेरा न्याय सुन। यदि शासक छल और मायावी यंत्रों से जनमत को प्रभावित करता है तो वह राजधर्म का त्याग है। प्रजा का विश्वास लूटना सबसे बड़ा नैतिक पतन है। यहां केवल विपक्ष को दोष देना उचित नहीं है, क्योंकि वे एक अत्यंत साधन-संपन्न सत्ता से जूझ रहे थे। किंतु यह सत्य है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। युवा सारथी और उसके मित्रों के पास दृष्टि तो थी, पर उनके पास वह संगठित शक्ति नहीं थी, जो कूटनीति का सामना कर सके। उनकी त्रुटि यह थी कि उन्होंने एकता को केवल एक विकल्प समझा, जबकि वह अनिवार्य आवश्यकता थी।’ `यदि प्रजा केवल मूकदर्शक बनी रहे और अपने अधिकारों के स्थान पर उपहारों या भय को चुन ले तो उसे भी उस विनाश की आहुति देनी पड़ती है।’ `आने वाली पीढ़ियां उस नेतृत्व से प्रश्न करेंगी, जो समय रहते दीवार पर लिखी इबारत न पढ़ सका। पराजय के बाद की एकता केवल आंखें खुलना है, जबकि विजय के लिए दूरदर्शिता अनिवार्य है। उन्हें अपनी भूमिकाओं को फिर से परिभाषित करना होगा, क्योंकि अकेले चलने का मोह छोड़कर मिलकर काम करना ही एकमात्र मार्ग है अन्यथा भविष्य का इतिहास उन्हें क्षमा नहीं करेगा।’ `सत्य कहा राजन, पर तू फिर बोल पड़ा और मैं चला!’ इतना कहते ही बेताल फिर से अट्टहास करता हुआ कंधे से उड़ा और श्मशान के अंधकार में ओझल होकर फिर उसी वृक्ष पर जा लटका। विक्रम ने तलवार वâसी और वापस बेताल लेने के लिए पीछे मुड़ गए।
