रमन
किसान आत्महत्या पर सबसे ज्यादा हो हल्ला मचता है। एक जमाने में दर्जनों फिल्में भी बनी हैं, तमाम राजनीतिक पार्टियां भी संसद और विधानसभाओं में रोना-धोना कर लेती हैं। जबकि किसानों द्वारा की जाने वाली खुदकुशी की संख्या इसके आस-पास भी नहीं है। दिहाड़ी मजदूर यानी वह, जिसके पास लगभग शून्य निजी मिल्कियत है, न कोई पक्का काम है, कहावत की भाषा में बोले तो रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाली हालत है, किसी वजह से इलाके में काम बंद हो, लॉकडाउन लग जाए, गैस तेल संकट की वजह से बंदी हो जाए तो भूखे मरने की नौबत आ जाए। यह तबका कुल आत्महत्याओं का सबसे बड़ा हिस्सा है, सरकारी आंकड़ों के हिसाब से। और इस तबके का संसद और विधानसभाओं में शून्य प्रतिनिधित्व है।
जब इस हत्यारी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मजदूरों का आक्रोश महज जिंदा रहने भर की मांगों को लेकर सड़कों पर फूटता है तो उसमें प्रशासन को पाकिस्तान, नेपाल, अर्बन नक्सल, फलाना-ढिमकाना की साजिश, मास्टरमाइंड और न जाने क्या-क्या दिखने लगते हैं।
