सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में अवैध भ्रूण लिंग जांच के ६२७ मामले सामने आना केवल सामाजिक मानसिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि सरकारी निगरानी और कानून लागू करने वाली व्यवस्था की गंभीर विफलता भी है। पीसीपीएनडीटी कानून को लागू हुए लगभग तीन दशक हो चुके हैं, फिर भी राज्य में भ्रूण का लिंग बताने वाले डॉक्टरों, फर्जी चिकित्सकों, दलालों और अवैध गर्भपात केंद्रों का नेटवर्क समाप्त नहीं हो सका।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार दर्ज ६२७ मामलों में केवल १२७ में दोषसिद्धि हुई, जबकि ३३२ मामले बरी होने या खारिज होने पर समाप्त हो गए। यानी अदालत तक पहुंचे मामलों में भी सरकार मजबूत साक्ष्य, सही दस्तावेजीकरण और प्रभावी पैरवी सुनिश्चित नहीं कर सकी। यह स्थिति कानून के भय को कमजोर करती है और अवैध कारोबार करने वालों का हौसला बढ़ाती है।
राज्य में ११,८३७ पंजीकृत सोनोग्राफी केंद्र हैं और सरकार लगभग सभी के निरीक्षण का दावा करती है। इसके बावजूद वर्ष २०२५-२६ में किए गए ११८ स्टिंग ऑपरेशनों में केवल १३ सफल हुए। इससे सवाल उठता है कि निरीक्षण वास्तविक हैं या केवल कागजी औपचारिकता? अब यह अपराध पंजीकृत केंद्रों तक सीमित नहीं है। पोर्टेबल सोनोग्राफी मशीनों, मोबाइल ऐप, घरों में जांच और दलालों के माध्यम से महिलाओं को अवैध गर्भपात केंद्रों तक पहुंचाने के मामले सामने आ रहे हैं। महाराष्ट्र का जन्म के समय लिंगानुपात केवल ८९९ बच्चियां प्रति १,००० लड़के बताया गया है। यह आंकड़ा सरकार की उपलब्धियों से अधिक उसकी विफलता की गवाही देता है। सरकार को केवल नए स्टिंग और कठोर कानूनों की घोषणा नहीं, बल्कि प्रत्येक जिले की दोषसिद्धि दर, लंबित मामलों, निलंबित डॉक्टरों और जब्त मशीनों का सार्वजनिक विवरण देना चाहिए। जब जांच कमजोर, मुकदमे लंबे और सजा दुर्लभ हो, तब अपराध बढ़ना आश्चर्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का स्वाभाविक परिणाम है।
सुरक्षा खामियों पर दो ब्लड सेंटर बंद
सुरक्षा मानकों के गंभीर उल्लंघन के बाद मुंबई और ठाणे के एक-एक ब्लड सेंटर को बंद कर दिया गया है। निरीक्षण के दौरान एक्सपायर उपकरण, अधूरे रिकॉर्ड, रखरखाव में लापरवाही और रक्त भंडारण से जुड़ी कमियां सामने आर्इं। कार्रवाई के बाद यह सवाल उठ रहा है कि इन केंद्रों से पहले जारी किए गए रक्त और रक्त उत्पादों की गुणवत्ता की दोबारा जांच होगी या नहीं। प्रशासन को संबंधित अवधि का पूरा रिकॉर्ड खंगालकर संभावित जोखिम वाले मरीजों की पहचान करनी चाहिए। रक्त केंद्रों की नियमित ऑडिट और कठोर निगरानी ही ऐसी लापरवाही रोक सकती है।
एलोपैथिक इलाज के आरोप में दो क्लीनिकों को नोटिस
बीएमसी ने गोरेगांव में संचालित दो क्लीनिकों को कथित रूप से आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता और वैध पंजीकरण के बिना एलोपैथिक पद्धति से इलाज करने पर नोटिस जारी किया है। नगर निकाय के स्वास्थ्य विभाग ने दोनों क्लीनिकों को तत्काल एलोपैथिक दवाएं लिखना और इस पद्धति से मरीजों का उपचार रोकने का निर्देश दिया है। अधिकारियों द्वारा क्लीनिक संचालकों की शैक्षणिक डिग्री, चिकित्सा परिषद में पंजीकरण, क्लीनिक के लाइसेंस तथा उपचार से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा रही है। जांच में नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और क्लीनिक बंद करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
मरीजों की जान से सौदा कर रहे थे ब्लड बैंक
जे. जे. अस्पताल और बदलापुर में खून के नाम पर चल रहे खतरनाक खेल का पर्दाफाश हुआ है। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने सर जे.जे. मेट्रोपॉलिटन ब्लड सेंटर और ठाणे के बदलापुर स्थित माया ब्लड सेंटर पर ताला जड़ दिया है, क्योंकि डेंगू समेत अन्य मरीजों को दिया जाने वाला खून ही सुरक्षित नहीं था। यह कार्रवाई केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के साथ किए गए संयुक्त निरीक्षण के बाद हुई। एफडीए को दोनों सेंटरों में खून के संग्रह, जांच और वितरण में गंभीर गड़बड़ियों की शिकायत मिली थी।
