सामना संवाददाता / मुंबई
चर्चगेट-नालासोपारा लोकल में मयंक लोहार की हत्या के मामले की जांच में सामने आया है कि आरोपी कथित रूप से करीब दो महीने से अपने बैग में चाकू रखकर रोजाना लोकल ट्रेन में यात्रा कर रहा था। यह खुलासा केवल आरोपी की मानसिकता नहीं, बल्कि मुंबई उपनगरीय रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी कमजोरी भी उजागर करता है।
मुंबई लोकल से प्रतिदिन लाखों यात्री सफर करते हैं, लेकिन अधिकांश स्टेशनों पर यात्रियों के सामान की नियमित जांच नहीं होती। मेटल डिटेक्टर कई स्थानों पर केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं और भीड़भाड़ के कारण संदिग्ध सामान पर नजर रखना कठिन हो जाता है। ऐसे में कोई व्यक्ति लगातार कई सप्ताह तक चाकू लेकर ट्रेनों में घूमता रहा और सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। जांच में यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि आरोपी चाकू क्यों रखता था, क्या उसका पहले भी किसी यात्री से विवाद हुआ था और क्या उसने कभी इस हथियार से किसी को धमकाने की कोशिश की थी। उसके मोबाइल फोन, यात्रा मार्ग, परिचितों और पुराने विवादों की भी गहन जांच जरूरी है। यह घटना बताती है कि रेलवे सुरक्षा केवल स्टेशनों पर पुलिसकर्मियों की मौजूदगी से सुनिश्चित नहीं हो सकती। संवेदनशील स्टेशनों पर आकस्मिक बैग जांच, सीसीटीवी की सक्रिय निगरानी, सादे कपड़ों में गश्त और यात्रियों के लिए त्वरित शिकायत तंत्र जरूरी है। हत्या के बाद आरोपी के बैग से चाकू मिलना कार्रवाई है, लेकिन असली सुरक्षा वह होती जो उसे दो महीने पहले ही रोक लेती।
खून से सने चाकू की सरगर्मी से तलाश!
मुंबई की लोकल ट्रेन में हुए चर्चित मयंक लोहार हत्याकांड की जांच में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती हत्या में इस्तेमाल चाकू की बरामदगी बन गई है। आरोपी रोशन सुवर्णा पुलिस की गिरफ्त में है, लेकिन वारदात में प्रयुक्त हथियार अब तक नहीं मिला है। पुलिस का मानना है कि आरोपी जानबूझकर चाकू छिपाने की सही जगह नहीं बता रहा, ताकि अदालत में उसके खिलाफ सबूत कमजोर पड़ जाएं। जांच अधिकारियों के अनुसार, आरोपी के बताए सभी संभावित स्थानों, रिक्शा रूट और उसके घर की गहन तलाशी ली गई, लेकिन हथियार का कोई सुराग नहीं मिला। पुलिस का कहना है कि आरोपी लगातार गुमराह करने की कोशिश कर रहा है और रिमांड के दौरान उससे पूछताछ जारी है। दूसरी ओर, मामले में चश्मदीद गवाह भी पुलिस के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं।
