मुख्यपृष्ठनए समाचारट्रंप की धमकी के पहले ही झुक चुकी मोदी सरकार?

ट्रंप की धमकी के पहले ही झुक चुकी मोदी सरकार?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डिजिटल सेवा कर लगाने वाले देशों से अमेरिका आने वाले सभी सामान पर १०० प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी देकर एक बार फिर व्यापार को राजनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। यह चेतावनी भले ही फिलहाल यूरोपीय देशों को लक्ष्य बनाती दिखाई दे, लेकिन भारत के लिए इससे अधिक असहज सवाल यह है कि मोदी सरकार अमेरिकी दबाव आने से पहले ही अपना डिजिटल कर ढांचा लगभग समाप्त कर चुकी है।
भारत ने विदेशी डिजिटल और ई-कॉमर्स कंपनियों की देश में होने वाली कमाई पर कर सुनिश्चित करने के लिए इक्वलाइजेशन लेवी लागू की थी। वर्ष २०२४ में दो प्रतिशत ई-कॉमर्स लेवी हटाई गई और अप्रैल २०२५ से ऑनलाइन विज्ञापनों पर लगने वाला छह प्रतिशत कर भी समाप्त कर दिया गया। सरकार ने इसे कर व्यवस्था सरल बनाने और अंतर्राष्ट्रीय कर सहमति के अनुरूप कदम बताया, लेकिन आलोचकों के अनुसार इससे गूगल, मेटा, अमेजन जैसी वैश्विक कंपनियों को राहत मिली और भारत ने अपनी विशाल डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कर लगाने का एक महत्वपूर्ण साधन छोड़ दिया।
डिजिटल टैक्स पर सरकार से तीखे सवाल
ट्रंप की ताजा धमकी बताती है कि अमेरिका मुक्त व्यापार की बात तभी तक करता है, जब तक उसकी कंपनियों के हित प्रभावित न हों। प्रâांस और ब्रिटेन जैसे देश अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने डिजिटल कर का बचाव कर रहे हैं, जबकि भारत ने अपने दोनों प्रमुख डिजिटल लेवी पहले ही वापस ले लिए। मोदी सरकार को अब स्पष्ट करना चाहिए कि इन करों से देश को हर वर्ष कितना राजस्व मिलता था, उन्हें हटाने से अमेरिकी बाजार में भारत को क्या ठोस लाभ मिला और विदेशी डिजिटल कंपनियों की भारत में अर्जित आय पर अब किस प्रभावी व्यवस्था से कर वसूला जा रहा है।
सौदेबाजी की खुली पोल
सरकार यदि बिना पारदर्शी लाभ बताए राष्ट्रीय कर नीति बदलती है, तो इसे कूटनीतिक सफलता नहीं कहा जा सकता। यह आशंका मजबूत होती है कि भारत ने व्यापारिक प्रतिशोध के डर से अपने कराधिकार से समझौता किया। ट्रंप की धमकी ने मोदी सरकार की उसी कमजोर सौदेबाजी को उजागर किया है।

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