मुख्यपृष्ठग्लैमर“जिंदगी को मैंने दिल से जिया,रूह से लिखा”-समीर अंजान

“जिंदगी को मैंने दिल से जिया,रूह से लिखा”-समीर अंजान

भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में समीर अंजान वह नाम हैं जिन्होंने चार दशक से ज़्यादा वक्त तक दिलों पर राज किया है। अपने शब्दों से भावनाओं को सुरों में ढालने वाले इस गीतकार ने संघर्ष, संवेदना और सृजन को जीवन का आधार बनाया। पिता अनजान साहब की विरासत, बनारस की मिट्टी और मुंबई के सपनों के बीच समीर का सफर एक जीवंत कहानी है— शब्दों, शिद्दत और संघर्ष की। पेश है दोपहर का सामना के संवाददाता “हिमांशु राज” से समीर अंजान से की गई खास बातचीत के मुख्य अंश:

आपके पिता अनजान साहब को लेखन या शब्द-साधना ईश्वरीय वरदान मानी जाती है। क्या यह प्रतिभा आपको विरासत में मिली?
उत्तर: मेरे पिताजी का लेखन सचमुच ईश्वर का वरदान था। क्योंकि वे गीतकार थे, इसलिए पोएट्री मेरी जेनेटिक प्रॉब्लम रही। शायद अगर मेरे पिता “अनजान” नहीं होते तो मैं शायर बनता ही नहीं। गीतकार का बीज मुझे वहीं से मिला और मैंने कोशिश की कि उनके नाम को रोशन कर सकूं। जो रचनात्मक लोग होते हैं, वे बनते नहीं, बने-बनाए भेजे जाते हैं। मेरे साथ भी यही वरदान रहा है।

 कहा जाता है कि आपके पिता आपको गीतकार नहीं बनाना चाहते थे। इसके पीछे क्या कारण था?
यह बिल्कुल सच है। जब मैं 23 साल का था, तब तक मैं उनसे केवल तीन बार मिला था। पहली बार उन्होंने मुझसे कहा— “कुछ भी बन जाना, लेकिन गीतकार मत बनना।” वे नहीं चाहते थे कि मैं उनके जैसे संघर्षों से गुजरूं। उन्होंने मुझे कॉमर्स में डाल दिया, पर भाग्य में कुछ और लिखा था। मैंने बैंक की नौकरी छोड़ी और अपने सपनों की राह पकड़ ली— अकेले, लेकिन आत्मविश्वास के साथ।

आपके पिता से पहली मुलाकात का अनुभव कैसा रहा?
महबूब स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के बाद हमने ‘पॉमपोज़’ रेस्टोरेंट में मुलाकात की। उन्होंने पूछा— “क्या कभी किसी लड़की से प्यार किया?” मैंने कहा, “हां।” जवाब मिला— “यह इंडस्ट्री भी एक महबूबा की तरह है, जो वफादार भी हो सकती है और बेवफा भी।” फिर उन्होंने कहा— “जन्नत के सपने देखे हैं तो मरने का साहस रखो।” यह सुनकर मैंने कहा, “जन्नत देखनी है तो मरना ही पड़ेगा।” उसी दिन उन्होंने कहा, “कल से मेरे पास आ जाओ।” वहीं से मेरा असली सफर शुरू हुआ।

 आपने अपने पिता से क्या सबसे बड़ा जीवन दर्शन सीखा?
उनका सबसे बड़ा कथन था— “ज़िंदगी तो बेवफ़ा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है, साथ लेकर जाएगी।” वह जीवन को बहुत गहराई से समझते थे। पहले लोग दिल से काम करते थे, अब दिमाग से करते हैं— इसलिए आज संवेदना का संगीत कम सुनाई देता है। हमने जो किया, दिल और रूह से किया, इसलिए आज भी वह लोगों के दिलों तक पहुंचता है।

 इंडस्ट्री में चार दशक के इस सफर को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: मैंने हर दशक का बदलाव देखा और खुद को बदला। अब शिद्दत की कमी है, लोग जल्दी आत्ममुग्ध हो जाते हैं। मेरे लिए हर दिन एक नया संघर्ष है। जब मैंने “चार बजे गए लेकिन पार्टी अभी बाकी है” या “अनारकली डिस्को चली” लिखा, तब भी मैं युवाओं की सोच को समझने की कोशिश कर रहा था। यही ज़रूरी है— खुद को बदलना और समय के साथ बढ़ना।

रचनात्मकता के क्षेत्र में एआई (Artificial Intelligence) को आप कितनी चुनौती मानते हैं?
एआई केवल उसी पर काम कर सकती है जो ‘व्यक्त’ है, लेकिन जो ‘अव्यक्त’ है— वहां वह नहीं पहुंच सकती। रचनात्मकता वहीं जन्म लेती है। इसलिए मैं इसे खतरा नहीं, बल्कि सहायक मानता हूं। एक शेर इस पर बिल्कुल फिट बैठता है—
“उससे मिलती-जुलती आवाज़ कहां से लाओगे,
ताजमहल तो बनवा दोगे, मुमताज़ कहां से लाओगे।”

पति और पिता के रूप में आप खुद को कैसे देखते हैं?
शायद यह प्रश्न मेरे परिवार से पूछा जाए तो बेहतर होगा। पर मैंने अपने सभी रिश्तों में वही ईमानदारी रखी जो अपने काम के प्रति रखता हूं। आज जो कुछ भी हूं, उसमें मेरी पत्नी, माता-पिता और बच्चों की भूमिका बहुत बड़ी है। बेटा अब अपने संगीत सफर की शुरुआत कर रहा है, और मैं चाहता हूं कि वह भी उसी लगन से चले, जैसे मैंने की थी।

बनारस का आपके जीवन में क्या महत्व है?
बनारस है तो समीर है। गंगा और बाबा विश्वनाथ की उस भूमि ने मुझे हर बार नया जन्म दिया है। बनारस ने मुझे शब्द, संस्कार और संवेदना दी। मैं जीवन भर उस धरती का ऋणी रहूंगा, जिसने मुझे समीर अंजान बनाया।

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