मुख्यपृष्ठस्तंभलालच की पराकाष्ठा, लापरवाही की पाठशाला

लालच की पराकाष्ठा, लापरवाही की पाठशाला

अनिल तिवारी

पीलीभीत के जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में सामने आया ‘करोड़पति चपरासी’ प्रकरण केवल एक कर्मचारी की चालाकी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की गहरी सड़ांध का संकेत है। जिस चतुर्थवर्गीय कर्मी को कार्यालय में वेतन बिल और टोकन जेनरेशन जैसा संवेदनशील काम सौंपा गया, उसी ने कथित रूप से फर्जी बेनिफिशियरी आईडी बनाकर सरकारी खाते से करोड़ों रुपए निकाल लिए। पुलिस जांच में कई खातों और महिलाओं की भूमिका सामने आई है, जिससे पता चलता है कि यह खेल अकेले संभव नहीं था। सवाल यह है कि वर्ष २०२४ से २०२६ तक सरकारी धन निकलता रहा और विभागीय निगरानी सोती रही? वेतन भुगतान, ट्रेजरी, बैंक सत्यापन और ऑडिट इनमें से कोई भी तंत्र समय पर चेतावनी क्यों नहीं दे सका? जब एक चपरासी सरकारी भुगतान प्रणाली में सेंध लगा सकता है, तो यह व्यक्ति विशेष से अधिक व्यवस्था की विफलता है। यह घटना अपवाद नहीं है। कर्नाटक के वाल्मीकि निगम घोटाले में भी सरकारी धन को कथित रूप से फर्जी खातों में भेजने और शेल खातों के जरिए घुमाने की बात जांच में सामने आई थी। ईडी ने इस मामले में करोड़ों की संपत्ति भी अटैच की। इसी तरह सरकारी योजनाओं में मृत या फर्जी लाभार्थियों के नाम पर भुगतान के मामले भी सामने आते रहे हैं; मैसूरु में गृह लक्ष्मी योजना के मृत लाभार्थियों के खातों से अनधिकृत निकासी के बाद करोड़ों रुपए की वसूली हुई। दरअसल, भ्रष्टाचार अब फाइलों की रिश्वत से आगे बढ़कर डिजिटल सिस्टम की कमजोरी तक पहुंच गया है। जहां पासवर्ड, टोकन, बेनिफिशियरी आईडी और भुगतान अनुमोदन कुछ हाथों में सिमट जाएं, वहां सरकारी खजाना लालचियों के लिए खुली तिजोरी बन जाता है। पीलीभीत प्रकरण चेतावनी है कि केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं; जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही, नियमित डिजिटल ऑडिट, दोहरे सत्यापन और भुगतान प्रणाली की स्वतंत्र निगरानी अनिवार्य है। वरना सरकारी लापरवाही और निजी लालच मिलकर जनता के पैसे की इसी तरह लूट जारी रखेंगे।

युद्ध, नाकेबंदी और समझौते के बीच फंसी दुनिया
होर्मुज की लहरों पर टकराती अर्थव्यवस्था!
ईरान पर अमेरिका-इजरायल की सैन्य कार्रवाई, होर्मुज के आसपास अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी और तेहरान-वॉशिंगटन के बीच तीखी बयानबाजी ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। ईरान ने अमेरिकी नाकेबंदी को अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए चेतावनी दी है कि इससे क्षेत्र में असुरक्षा और बढ़ेगी। अमेरिका दबाव बनाकर अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सकेगा। अब यह विवाद केवल युद्ध या सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि समुद्री व्यापार, अंतर्राष्ट्रीय कानून, अर्थव्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा प्रश्न बन गया है। ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति की उस टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाई की तुलना ‘समुद्री लुटेरों’ से की थी। ईरान के अनुसार, यह कोई जुबान फिसलना नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुद्री आवाजाही के विरुद्ध अमेरिकी कार्रवाइयों की गंभीर स्वीकारोक्ति है। ईरान ने संयुक्त राष्ट्र से भी मामले में हस्तक्षेप की अपील की है। दरअसल, ट्रंप ने ईरान पर आरोप लगाया है कि पिछले ४७ वर्षों से वह दुनिया को धमका कर दादागीरी कर रहा है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व व आंतरिक व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा है कि अमेरिका को यह तक स्पष्ट नहीं कि तेहरान में वो किससे बातचीत करे। वे लगातार दावा कर रहे हैं कि ईरान समझौते के लिए बेचैन है। ईरानी सैन्य शक्ति को भारी क्षति पहुंची है। उनके पास न रडार बचे हैं, न नेतृत्व और अब उसके सामने केवल दो रास्ते हैं, बातचीत या आगे की सैन्य कार्रवाई का सामना करना। यह टिप्पणी बताती है कि अमेरिका ईरान को सैन्य और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, ईरान इसे अपनी संप्रभुता और सम्मान पर हमला मान रहा है। अमेरिका ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ की नीति जारी रखना चाहता है और ईरान समझौता अपनी शर्तों पर चाहता है। लिहाजा ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को १४ सूत्रीय प्रस्ताव भेजा है। इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्ति, होर्मुज और ईरान से जुड़ी नाकेबंदी हटने, अमेरिकी सैन्य दबाव कम कर व्यापक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही गई है। यह प्रस्ताव पहले भेजे गए अमेरिकी नौ सूत्रीय प्रस्ताव का जवाब है। जिसमें दो महीने के संघर्ष विराम की समय-सीमा थी, लेकिन तेहरान लंबी अंतरिम व्यवस्था के पक्ष में नहीं है। वो है कि ३० दिनों के भीतर व्यापक समाधान निकले और उसे स्थायी युद्ध-समाप्ति माना जाए। लेकिन ट्रंप ने उनके कई प्रावधानों को अस्वीकार्य बताया है। इसी से संकट गहरा रहा है। ट्रंप चाहते हैं कि जब तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कठोर आश्वासन नहीं मिलता, तब तक वे नहीं हटेंगे। अगर ईरान ने कुछ अनुचित किया तो हमले फिर शुरू हो सकते हैं।
बहरहाल, इस संघर्ष का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं है। खाड़ी देशाें समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्था, तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। यहां तनाव बढ़ने का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर, वैश्विक महंगाई और भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर पड़ रहा है। भारत पर आयात बिल बढ़ने, रुपए पर दबाव बनने और महंगाई की मार आम आदमी तक पहुंचने लगी है।
कुल मिलाकर पश्चिम एशिया का यह संकट अब केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि दुनिया भर की कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और शक्ति-संतुलन की बड़ी परीक्षा बन चुका है। होर्मुज की समुद्री लहरों पर आज केवल जहाज नहीं चल रहे, बल्कि महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाएं, तेल की राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय कानून की मर्यादा और आने वाले विश्व-व्यवस्था की दिशा भी तैर रही है।

नाटो सदस्य होने के बावजूद तुर्की, कूटनीतिक लाभ के लिए अमेरिका-इजरायल हमलों की निंदा कर खुद को मुस्लिम जगत की मजबूत आवाज के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इधर, ट्रंप भारत-पाकिस्तान संघर्ष रोकने और नोबेल शांति पुरस्कार के दावे को भी मजबूत कर रहे हैं। एक तरफ सैन्य दबाव और नाकेबंदी की भाषा, दूसरी तरफ शांति प्रस्थापित करने वाले नेता की छवि। यही इस दौर की कूटनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है, युद्ध भी, नाकेबंदी भी, समझौते की बात भी और शांति का दावा भी।

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