के.पी. मलिक
भारत इस समय एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा है, जहां महंगाई, बेरोजगारी, गिरती क्रयशक्ति और वैश्विक आर्थिक दबाव आम नागरिक की जिंदगी को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। पेट्रोल-डीजल लगातार महंगा हो रहा है। खाद्य तेल रसोई का सबसे बड़ा बोझ बन चुका है। खेती की लागत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है। बाजार में अनिश्चितता है, छोटे कारोबार दबाव में हैं और मध्यम वर्ग अपनी बचत टूटते हुए देख रहा है। इस पूरे संकट के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर सरकार की भूमिका क्या रह गई है? क्या जनता केवल त्याग और समायोजन करने के लिए है, जबकि सत्ता का काम सिर्फ भाषण, प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित रह गया है?
प्रधानमंत्री और सरकार की तरफ से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि लोग पेट्रोल कम इस्तेमाल करें, डीजल बचाएं, खाने वाले तेल की खपत घटाएं और गैरजरूरी खरीदारी से बचें। यानी हर आर्थिक चुनौती का समाधान अब ‘जनता खुद एडजस्ट करे’ मॉडल में खोजा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार जनता से मितव्ययिता की अपील कर रही है, तब क्या सत्ता खुद उसी अनुशासन का पालन करती दिखाई दे रही है?
यही वह विरोधाभास है, जो जनता के भीतर असंतोष पैदा करता है। एक तरफ लोगों से खर्च कम करने की अपील होती है तो दूसरी तरफ भव्य रोड शो, विशाल राजनीतिक कार्यक्रम, करोड़ों रुपए के प्रचार अभियान और लगातार चुनावी यात्राएं उसी चमक-दमक के साथ जारी रहती हैं। जनता यह पूछने लगी है कि क्या आर्थिक संकट केवल आम आदमी के लिए है? क्या संयम सिर्फ नागरिकों के हिस्से आएगा और सत्ता अपने वैभव में कोई कटौती नहीं करेगी?
असल समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं की भी है। जब पूरी दुनिया ऊर्जा संकट, वैश्विक महंगाई और सप्लाई चेन टूटने जैसी चुनौतियों को लेकर रणनीतिक तैयारी कर रही थी, तब भारत में राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा चुनावी अभियानों, प्रचार आधारित राजनीति और व्यक्तित्व केंद्रित इवेंट्स में उलझा रहा। सरकार के पास समय था कि वह खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए तिलहन किसानों को मजबूत करती, पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा मॉडल को तेजी से लागू करती, कृषि लागत नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक नीति बनाती और महंगाई को रोकने के लिए बाजार निगरानी तंत्र मजबूत करती। लेकिन इन मूलभूत सुधारों की जगह प्राथमिकता राजनीतिक प्रबंधन को दी गई।
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है। सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी, तिल और सोयाबीन पैदा करने वाले किसानों को स्थायी समर्थन नहीं मिला। आयातित तेलों को सस्ता रखकर बाजार तो संभाला गया, लेकिन घरेलू किसान कमजोर होता गया। नतीजा यह हुआ कि जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ीं, देश की रसोई संकट में आ गई। अब जनता से कहा जा रहा है कि ‘तेल कम खाइए।’ जबकि असली सवाल यह होना चाहिए कि देश को इस स्थिति तक पहुंचने क्यों दिया गया?
ठीक यही स्थिति खेती और खाद नीति में भी दिखाई देती है। किसानों को खाद पर सब्सिडी देकर सरकार इसे बड़ी राहत के रूप में पेश करती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि किसान की लागत लगातार बढ़ रही है। डीजल महंगा, बिजली अस्थिर, बीज और कीटनाशक महंगे, सिंचाई खर्च बढ़ता हुआ और ऊपर से फसलों का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित नहीं। यानी किसान को राहत नहीं, केवल जिंदा रहने लायक सहारा दिया जा रहा है। कृषि नीति का उद्देश्य किसान को आत्मनिर्भर बनाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को अस्थायी रूप से संतुलित रखना बन गया है।
यह संकट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सरकार ने समय रहते कठोर लेकिन जरूरी कदम उठाने से परहेज किया। महंगाई नियंत्रण के लिए मजबूत बाजार हस्तक्षेप नहीं हुए। बेरोजगारी पर ठोस औद्योगिक नीति नहीं बनी। छोटे उद्योगों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित समर्थन नहीं मिला। चुनावी राजनीति और तात्कालिक लोकप्रियता ने दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों को पीछे धकेल दिया। अब जब वैश्विक दबाव बढ़ रहे हैं तो सरकार जनता से त्याग मांग रही है।
यह पैटर्न नया नहीं है। कोविड काल में भी हमने यही देखा था। शुरुआत में खतरे को हल्के में लेना, फिर अचानक जनता पर अनुशासन और त्याग का पूरा बोझ डाल देना। तब प्रतीकात्मक आयोजनों को समाधान की तरह प्रस्तुत किया गया, जबकि स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों की कीमत आम लोगों ने चुकाई। आज आर्थिक संकट के दौर में भी सरकार की प्राथमिकता कई बार समाधान से ज्यादा संदेश निर्माण और छवि प्रबंधन पर केंद्रित दिखाई देती है।
लोकतंत्र में जनता त्याग करने से पीछे नहीं हटती। भारत का समाज कठिन समय में हमेशा एकजुट होकर खड़ा हुआ है। लेकिन लोकतंत्र केवल जनता के त्याग पर नहीं चलता, बल्कि सत्ता की जवाबदेही पर भी चलता है। यदि सरकार सचमुच चाहती है कि लोग संयम बरतें तो सबसे पहले सत्ता को खुद उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। सरकारी फिजूलखर्ची कम होनी चाहिए। भव्य आयोजनों और प्रचार अभियानों पर नियंत्रण होना चाहिए। चुनावी खर्चों की पारदर्शिता बढ़नी चाहिए। मंत्रियों और नेताओं के अनावश्यक वैभव पर अंकुश लगना चाहिए। जनता को तभी लगेगा कि संकट साझा है, केवल थोपे गए बोझ का नाम नहीं।
बहरहाल, इसके साथ ही आर्थिक मोर्चे पर कुछ बुनियादी सुधारों की तत्काल जरूरत है। तिलहन और दलहन उत्पादन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दीर्घकालिक मिशन लागू किया जाए। किसानों को कानूनी और भरोसेमंद एमएसपी मिले। छोटे उद्योगों और ग्रामीण रोजगार को मजबूत करने के लिए स्थानीय उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था विकसित की जाए। ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन, एथेनॉल और नवीकरणीय ऊर्जा में गंभीर निवेश हो। और सबसे महत्वपूर्ण, सरकार जनता को केवल सलाह देने के बजाय नीति आधारित समाधान प्रस्तुत करे। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में आर्थिक संकट से भी ज्यादा खतरनाक चीज होती है जनता का टूटता हुआ भरोसा। जब जनता यह महसूस करने लगे कि त्याग सिर्फ उसी के हिस्से है और सत्ता केवल तमाशा देख रही है, तब समस्या केवल महंगाई या बेरोजगारी की नहीं रहती, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता के संकट में बदल जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
