महेश राज
आखिरकार, दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश ने उस कड़वे सच पर से पर्दा उठा ही दिया, जिसे हम सब ‘डार्क मोड’ में छुपाए बैठे थे। अदालत ने गूगल और एप्पल को फटकार लगाते हुए कहा है कि अपने स्टोर्स से पोर्नोग्राफी, ड्रग्स और वेश्यावृत्ति वाले ऐप्स हटाओ, क्योंकि ‘हम पूरी पीढ़ी को बर्बाद होते नहीं देख सकते।’
अदालत की इस चिंता पर जब केंद्र सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने खड़े होकर बेहद बेचारगी से कहा कि हुजूर, सरकार अकेले दुनियाभर की हर चीज ब्लॉक नहीं कर सकती तो देश की सवा सौ करोड़ जनता की आंखों में आंसू आ गए। वाकई, हम कितने जालिम हैं! हम एक बेचारी सरकार से क्या-क्या उम्मीदें लगा बैठते हैं?
चौबीस घंटे का टाइम-टेबल और एक अदद सरकार
जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, सरकार कोई सुपर कंप्यूटर तो है नहीं। उसके पास भी चौबीस ही घंटे होते हैं और उन घंटों में प्राथमिकताओं की एक लंबी कतार है, गौर फरमाइए…
सुबह का सत्र
सरकार की पहली और सबसे पवित्र जिम्मेदारी है, अपनी सरकार बचाना और विपक्ष की गिराना। अब जब सुबह-सुबह रिसॉर्ट में बंद विधायकों की गिनती करनी हो तो कोई गृह मंत्रालय का बाबू प्ले स्टोर पर बैठकर ‘अश्लील ऐप्स’ की लिस्ट थोड़े ही बनाएगा? यह बात अलग है कि उनकी ट्रोल सेना काम पर लगी रहती है।
दोपहर का सत्र
इसके बाद नंबर आता है भ्रष्टाचार मिटाने का। अब यह इतनी पेचीदा कला है कि इसमें यह भी देखना पड़ता है कि कौन-सा भ्रष्टाचारी अभी विपक्ष में है और कौन-सा वाशिंग मशीन से धुलकर अपनी तरफ आ चुका है।
शाम का सत्र
शाम होते ही आईटी रूल्स, २०२१ की याद आती है। इंस्टाग्राम रील्स पर अश्लीलता परोसी जा रही है, युवा पीढ़ी उंगलियां घिस-घिसकर डिप्रेशन में जा रही है। लेकिन सरकार अकेले क्या-क्या ब्लॉक करे? उधर ‘एक्स’ (ट्विटर) पर मीम्स ब्लॉक करो तो इधर प्ले स्टोर पर कोई नया ‘चैट ऐप’ आ जाता है।
रात का सत्र
इन सब घरेलू झंझटों के बाद वैश्विक जिम्मेदारियां भी निभानी हैं। दुनिया के मंच पर जाकर जलवायु परिवर्तन पर भाषण देना है और महाशक्तियों से हाथ मिलाकर ग्लोबल इमेज भी चमकानी है।
सवाल यह है कि ‘देर से आए, दुरुस्त आए’ या सिर्फ ‘आए’? इस पूरे चक्रव्यूह के बीच, दिल्ली हाई कोर्ट का यह कहना कि कंपनियों को पूरी सावधानी बरतनी होगी’, दरअसल, सरकार के लिए एक बहुत बड़ा सहारा है। जब सरकार खुद मान चुकी है कि वह हर चीज पर नजर नहीं रख सकती, तो अब सारा दारोमदार सुंदर पिचाई और टिम कुक पर है।
विडंबना तो देखिए जो टेक कंपनियां आपके मन की बात जानकर अगले ही पल आपको उसी का विज्ञापन दिखाने लगती हैं, वे इतनी ‘मासूम’ बन जाती हैं कि उन्हें अपने ही प्लेटफॉर्म पर चल रहा ड्रग्स और वेश्यावृत्ति का धंधा दिखाई नहीं देता और हमारी सरकार, जो हर नागरिक के आधार से लेकर पैन कार्ड तक की कुंडली रखती है, वह इंटरनेट के इस दलदल के सामने घुटने टेक देती है। रूबिका थापा की जनहित याचिका ने उस कड़वी हकीकत को उजागर किया है कि भारत का युवा आज किताबों से ज्यादा स्क्रीन पर और भविष्य बनाने से ज्यादा ‘स्क्रॉल’ करने में बर्बाद हो रहा है। लेकिन इसका सबसे दुखद पहलू यही है कि ‘देर से आए, दुरुस्त आए’ का नारा भी अब बेअसर लगने लगा है, क्योंकि जब तक सरकारें अपनी कुर्सी बचाने, गिराने और बनाने के राष्ट्रीय कर्तव्य से मुक्त नहीं होंगी, तब तक देश की ‘पीढ़ी’ को बचाने का काम ऐसे ही गूगल और एप्पल के भरोसे छोड़ दिया जाएगा। आखिर बेचारी सरकार भी क्या-क्या करे? वह देश का चरित्र सुधारे या अपनी सत्ता का गणित?
