प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने १० मई २०२६ को नागरिकों से पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने, यात्रा सीमित करने और ऊर्जा बचत की अपील की थी। सरकार के विभिन्न महकमों ने भी बाद में हरसंभव र्इंधन बचत की तस्वीर दिखाई। लेकिन सवाल यह है कि इस अपील का पालन आम जनता करे या मंत्री और नेता भी? वाराणसी में राज्यमंत्री हंसराज विश्वकर्मा के स्वागत में चार बुलडोजर खड़े किए गए, काफिले में दस से अधिक वाहन चले और कई जगह जाम लगा।
यहीं विरोधाभास साफ दिखता है। एक तरफ जनता से कहा जा रहा है कि पेट्रोल-डीजल बचाइए, अनावश्यक यात्रा घटाइए, देश की ऊर्जा सुरक्षा में सहयोग कीजिए। दूसरी तरफ मंत्री के स्वागत में बुलडोजर, वाहनों का काफिला, फूलों की बारिश और सड़क जाम, यह वैâसी बचत है?
एक मध्यम आकार की जेसीबी जैसी मशीन औसतन ५ से ७ लीटर डीजल प्रति घंटे खर्च कर सकती है। चार मशीनें केवल स्वागत के लिए खड़ी हों, साथ में दस से अधिक गाड़ियां काफिले में चलें और जाम में फंसे सैकड़ों वाहनों का र्इंधन अलग से जले तो यह केवल प्रतीकात्मक खर्च नहीं, सार्वजनिक संसाधनों की खुली बर्बादी है। सरकार अगर सचमुच र्इंधन बचत को राष्ट्रीय जिम्मेदारी मानती है तो पहला नियम वीआईपी संस्कृति पर लागू होना चाहिए। मंत्रियों के काफिले घटें, स्वागत कार्यक्रम सादगी से हों, बुलडोजर और भारी मशीनों का प्रदर्शन बंद हो और राजनीतिक आयोजनों से सड़कें जाम न हों। जनता से त्याग मांगनेवाली राजनीति को पहले अपने मंच, काफिले और स्वागत-शैली में संयम दिखाना होगा। वरना संदेश यही जाएगा, डीजल बचत आम आदमी के लिए उपदेश है, नेताओं के लिए नहीं।
पेट्रोलियम संकट में सिनगैस से उम्मीद!
केंद्र सरकार ने कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए ३७,५०० करोड़ रुपए की सहायता योजना को मंजूरी दी है। सरकार का दावा है कि इससे करीब ३ लाख करोड़ रुपए का निवेश आ सकता है और भारत की आयातित र्इंधन, गैस और रसायनों पर निर्भरता घटेगी। एनडीटीवी के अनुसार, भारत २०३० तक १०० एमटीपीए कोयला गैसीकरण क्षमता का लक्ष्य रख रहा है। कोयला गैसीकरण में कोयले को सीधे जलाया नहीं जाता, बल्कि सीमित ऑक्सीजन और भाप के साथ अत्यधिक तापमान व दबाव में गर्म किया जाता है। इससे ‘सिनगैस’ बनती है, जिसमें मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन होते हैं। इसी गैस से मेथनॉल, अमोनिया, यूरिया, सिंथेटिक नेचुरल गैस, हाइड्रोजन, तरल र्इंधन और रसायन बनाए जा सकते हैं। यह योजना ऐसे समय आई है, जब ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण तेल-गैस आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है। भारत हर साल एलएनजी, मेथनॉल, अमोनिया, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य उत्पादों के आयात पर भारी खर्च करता है। एनडीटीवी के अनुसार, वित्त वर्ष २०२५ में ऐसे प्रतिस्थापनीय उत्पादों का आयात बिल २.७७ लाख करोड़ रुपए था। भारत में एलएनजी, अमोनिया, मेथनॉल और उर्वरक जैसे उत्पादों के आयात पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। वित्त वर्ष २०२५ में ऐसे उत्पादों का आयात बिल करीब २.७७ लाख करोड़ रुपए बताया गया है। यदि गैसीकरण सफल रहा, तो यह न केवल आयात घटाएगा, बल्कि उर्वरक, रसायन और औद्योगिक ऊर्जा क्षेत्र में नई क्षमता भी पैदा करेगा। हालांकि, चुनौती भी कम नहीं है। यह तकनीक पूंजी-प्रधान है, पर्यावरणीय सवालों से घिरी है और इसे सचमुच स्वच्छ बनाने के लिए कार्बन वैâप्चर जैसी व्यवस्थाएं जरूरी होंगी। इसलिए यह योजना ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन इसकी सफलता तकनीक, पारदर्शिता और पर्यावरणीय अनुशासन पर निर्भर करेगी।
