सना खान
सीमा हर महीने राशन खरीदते समय हिसाब लगाती है। आटा, चावल, दाल और तेल हर चीज बजट में फिट करनी होती है। दुकान पर पैकेट और खुले तेल की कीमत में कुछ रुपए का फर्क था। सीमा ने सस्ता तेल ले लिया। उसके लिए ये रुपए भी मायने रखते थे।
लेकिन महाराष्ट्र में खुले तेल पर लगी रोक के बाद सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, खाने की सुरक्षा का भी है। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने २० अगस्त को राज्य में खुले खाद्य तेल की बिक्री पर रोक लगा दी। अब तेल सीलबंद और पूरी जानकारी वाले पैकेट में ही बेचना होगा। आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं। वित्त वर्ष २०२५-२६ में एफडीए ने खाद्य तेल के १,२४७ नमूने लिए। इनमें ७७ घटिया, १३ असुरक्षित और १५ गलत ब्रांडिंग वाले पाए गए। इसी दौरान करीब ३,२०,७८१ किलो तेल, जिसकी कीमत लगभग ५.३१ करोड़ रुपए थी, जब्त किया गया। जांच में मिलावट, बिना लाइसेंस कारोबार, ज्यादा अम्लता और ज्यादा ट्रांस-फैट जैसी गड़बड़ियां भी सामने आर्इं। खुले तेल की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उसके स्रोत और गुणवत्ता की जानकारी आसानी से नहीं मिलती। पैकिंग और लेबल न होने से किसी शिकायत की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना भी मुश्किल हो सकता है।
लेकिन नियम लागू करने के साथ यह भी जरूरी है कि सुरक्षित और अच्छी गुणवत्ता वाला पैक तेल आम परिवार की पहुंच में रहे। सीमित आमदनी वाले घर के लिए कीमत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उपभोक्ता को तेल खरीदते समय सील, लेबल, बनाने की तारीख और इस्तेमाल की आखिरी तारीख जरूर देखनी चाहिए। एफडीए ने खुले और बिना सील वाले तेल से बचने की अपील की है। सीमा के लिए उस दिन कुछ रुपए बचाना जरूरी था। लेकिन खाने की चीज चुनते समय सिर्फ कीमत नहीं, उसकी गुणवत्ता भी देखनी होगी। सस्ता तेल चुनने की मजबूरी बनाम सुरक्षित तेल की जरूरत-यही इस पैâसले का असली सवाल है।
