मुख्यपृष्ठनए समाचार‘अच्छे दिनों’ की खुली पोल!

‘अच्छे दिनों’ की खुली पोल!

– आंकड़ों ने खोली विकास के दावों की कलई
-महंगाई के मोर्चे पर जेब खाली, रसोई महंगी

उमन गुप्ता / मुंबई

महंगाई पर सरकारी आंकड़े भले ही राहत की तस्वीर दिखाने की कोशिश करें, लेकिन बाजार की तस्वीर अलग कहानी कह रही है। जुलाई २०२६ में खुदरा महंगाई दर ४.४५ प्रतिशत रही, जो पिछले महीनों की तुलना में बढ़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी महंगाई के दोबारा व्यापक रूप लेने को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। आरबीआई की अगस्त बैठक के मिनट्स में खाद्य, र्इंधन और इनपुट लागत बढ़ने से महंगाई के व्यापक असर की आशंका जताई गई है और असली चिंता थोक बाजार में दिखाई देती है। उल्लेखनीय है कि जून २०२६ में थोक महंगाई दर ९.८७ प्रतिशत तक पहुंच गई, जो ४४ महीने का उच्च स्तर बताया गया। र्इंधन और बिजली की कीमतों में भी तेज वृद्धि दर्ज हुई। इसका मतलब साफ है। आज थोक बाजार में लागत बढ़ती है तो कल उसका बोझ खुदरा बाजार में आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है।
सरकार के सामने असली परीक्षा
सरकार के लिए चुनौती केवल सीपीआई को नियंत्रित रखना नहीं है। असली परीक्षा यह है कि खाद्य पदार्थों, र्इंधन और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें आम परिवार की पहुंच में रहें। आरबीआई ने भी चेतावनी दी है कि यदि खाद्य, र्इंधन और अन्य लागतों की वृद्धि व्यापक महंगाई में बदलती है तो मौद्रिक नीति को सख्त करना पड़ सकता है। सवाल यह है कि जब सरकार विकास और मजबूत अर्थव्यवस्था के बड़े-बड़े दावे करती है, तब आम आदमी की रसोई का हिसाब क्यों बिगड़ रहा है? जीडीपी के आंकड़े देश की आर्थिक तस्वीर का एक हिस्सा हैं, लेकिन बाजार की टोकरी में महंगाई का असर सीधे दिखाई देता है।
घर का बिगड़ा बजट
महंगाई का सबसे बड़ा असर निम्न और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। वेतन उतनी तेजी से नहीं बढ़ता, लेकिन दूध, सब्जी, दाल, चीनी, ईंधन, बिजली, किराया और परिवहन जैसी जरूरी चीजों की लागत बढ़ती रहती है। ऐसे में ४.४५ प्रतिशत की औसत सीपीआई दर भी हर परिवार के अनुभव को पूरी तरह नहीं बताती। जिस परिवार की आय का बड़ा हिस्सा भोजन और रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च होता है, उसके लिए कुछ वस्तुओं की तेज कीमत वृद्धि औसत महंगाई से कहीं अधिक भारी पड़ती है।

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