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नूर खान एयरबेस पर चीन-तुर्किये की रहस्यमय सैन्य हलचल क्यों?

-६० घंटे में सैन्य विमानों की आवाजाही ने बढ़ाई बेचैनी; क्या पाकिस्तान हथियार भर रहा है या बड़े क्षेत्रीय सैन्य नेटवर्क की तैयारी?

शोधपरक विश्लेषण / अनिल तिवारी

पाकिस्तान के नूर खान और मसूर एयरबेस पर पिछले कुछ दिनों में चीन और तुर्किये के सैन्य विमानों की असामान्य आवाजाही ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय सुरक्षा सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया है कि करीब ६० घंटे के भीतर भारी सैन्य परिवहन विमानों ने पाकिस्तान के अलग-अलग एयरबेस के कई चक्कर लगाए।
चीनी सैन्य विमान रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस और कराची के मसूर एयरबेस पर देखे जाने की खबर है, जबकि तुर्किये का सैन्य परिवहन विमान भी पाकिस्तान की ओर ट्रैक किया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए तीन अलग-अलग चीजों को अलग करना जरूरी है, सैन्य ट्रांसपोर्ट विमानों की पाकिस्तान आवाजाही, चीन के लड़ाकू विमानों की क्षेत्रीय उड़ान और पाकिस्तान-सऊदी अरब-तुर्किये के नए रक्षा समझौते की टाइमिंग। नूर खान एयरबेस रावलपिंडी में पाकिस्तान के सैन्य सत्ता केंद्र के बेहद करीब स्थित है। यह पाकिस्तान वायुसेना के एयर मोबिलिटी और रणनीतिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का प्रमुख केंद्र है। यहां से सैनिकों, सैन्य उपकरणों और वीआईपी आवाजाही का संचालन होता है। पाकिस्तान सेना का मुख्यालय और उसके परमाणु कमांड ढांचे से जुड़े संस्थान भी आसपास मौजूद हैं। यही कारण है कि किसी विदेशी सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान का यहां उतरना अपने आप में ध्यान खींचता है। उस पर नूर खान का महत्व भारत के लिए एक और कारण से बढ़ जाता है। १० मई २०२५ को भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भारतीय हमलों में नूर खान एयरबेस भी निशाना बना था। अर्थात पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ हवाई अड्डा नहीं, बल्कि उसकी सैन्य कमान, लॉजिस्टिक्स और संकट के समय तेजी से संसाधन पहुंचानेवाली नसों में से एक है।
क्या चीन-तुर्किये पाकिस्तान में हथियार उतार रहे हैं?

तमाम रिपोर्टों में सुरक्षा सूत्रों ने आशंका जताई है कि इन सैन्य विमानों के जरिये ड्रोन, हथियार या अन्य रक्षा उपकरण पाकिस्तान पहुंचाए गए हैं। तुर्किये का पाकिस्तान से पहले ही गहरा रक्षा संबंध है। ड्रोन, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और एयरोस्पेस तकनीक तक दोनों देशों का सहयोग पैâला हुआ है। चीन तो पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा आपूर्तिकर्ता है और दोनों मिलकर जेएफ-१७ लड़ाकू विमान भी बनाते हैं।
चीन ने पुष्टि की है कि उसकी वायुसेना के जे-१६ लड़ाकू विमान, वाईवाई-२०ए टैंकर, वाई-२० परिवहन विमान, केजे-५०० प्रारंभिक चेतावनी विमान तथा अन्य प्लेटफॉर्म मिस्र में ‘ईगल्स ऑफ सिविलाइजेशन-२०२६’ संयुक्त सैन्य अभ्यास के लिए भेजे गए हैं। चीनी रक्षा मंत्रालय ने १४ अगस्त को इस अभ्यास की पहले ही घोषणा कर दी थी। २१ अगस्त को चीन ने आधिकारिक रूप से बताया कि यह बेड़ा ६,००० किलोमीटर से अधिक की अंतरमहाद्वीपीय उड़ान पूरी कर मिस्र पहुंच चुका है और रास्ते में जे-१६ विमानों को वाईवाई-२०ए टैंकर से हवा में ईंधन दिया गया।
फिर असली रहस्य क्या है?
रहस्य चीनी जे-१६ नहीं बल्कि चीनी और तुर्की भारी सैन्य ट्रांसपोर्ट विमानों की बार-बार पाकिस्तान लैंडिंग है। युद्ध या युद्ध-पूर्व तैयारी में लड़ाकू विमान जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतना ही महत्वपूर्ण एयरलिफ्ट नेटवर्क होता है। भारी परिवहन विमान तेजी से; मिसाइल और ड्रोन, स्पेयर पार्ट्स- रडार एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, संचार प्रणाली, ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम, इंजीनियरिंग सामग्री और सैनिक और तकनीकी कर्मचारी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा सकते हैं।
मक्का रक्षा समझौते के तुरंत बाद हलचल
इस गतिविधि की टाइमिंग इसलिए और महत्वपूर्ण है, क्योंकि ७ अगस्त २०२६ को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते में एक देश पर हमले को तीनों पर हमला मानने का सिद्धांत रखा गया है। पाकिस्तान के पास परमाणु प्रतिरोधक क्षमता और बड़ी सेना है। तुर्किये के पास नाटो अनुभव, ड्रोन और आधुनिक रक्षा उद्योग है। सऊदी अरब आर्थिक संसाधन और पश्चिम एशिया में रणनीतिक प्रभाव देता है। अगर इन्हीं दिनों पाकिस्तान में तुर्की सैन्य लॉजिस्टिक्स भी बढ़ती दिखाई देती है।
चीन इस त्रिकोण में कहां है?
चीन मक्का समझौते का सदस्य नहीं है, लेकिन चीन-पाकिस्तान सैन्य साझेदारी अलग और कहीं पुरानी है। इसलिए एक ऐसी स्थिति बन रही है, जिसमें पाकिस्तान के पास पश्चिम में तुर्किये-सऊदी सुरक्षा ढांचा और पूर्व में चीनी रक्षा आपूर्ति नेटवर्क एक साथ उपलब्ध हैं। यही भारत के लिए वास्तविक सामरिक चिंता हो सकती है। २०२५ के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद पाकिस्तान के कई एयरबेस और सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचने की रिपोर्ट आई थी। ऐसे में पाकिस्तान के लिए अगले चरण का स्वाभाविक सैन्य काम होगा। क्षतिग्रस्त प्रणालियों की मरम्मत, उपकरणों की खरीद, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम को मजबूत करना तथा बाहरी सप्लाई लाइनों को अधिक विश्वसनीय बनाना। इसी संदर्भ में मौजूदा एयरलिफ्ट की गतिविधि ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देती है। कुछ रक्षा रिपोर्टों ने तुर्किये से पाकिस्तान को अतिरिक्त मोबाइल मिशन कंट्रोल सिस्टम मिलने का दावा भी किया है।
तीन संभावनाएं
पहली संभावना: नियमित रक्षा आपूर्ति। चीन और तुर्किये पहले से पाकिस्तान के रक्षा भागीदार हैं। संभव है कि उड़ानें पहले से तय उपकरण, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सामग्री पहुंचा रही हों।
दूसरी संभावना: २०२५ के नुकसान के बाद तेज पुनर्सशस्त्रीकरण। लगातार कई भारी एयरलिफ्ट यदि पुष्ट होती हैं तो पाकिस्तान महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों को अपेक्षाकृत तेजी से फिर तैयार कर रहा हो सकता है।
तीसरी संभावना: किसी बड़े आगामी सैन्य ऑपरेशन की तैयारी। सबसे सनसनीखेज संभावना यही है, लेकिन फिलहाल इसके समर्थन में सबसे कम सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध हैं। कोई सैनिक लामबंदी, लड़ाकू स्क्वाड्रन की व्यापक अग्रिम तैनाती या पाकिस्तान की ओर से युद्ध-स्तरीय अलर्ट का पुष्ट सबूत सामने नहीं है।
भारत को किस बात पर नजर रखनी चाहिए?
भारत के लिए असली चेतावनी किसी एक विमान से नहीं, बल्कि पैटर्न से निकलेगी। यदि आनेवाले दिनों में चीन और तुर्किये के भारी एयरलिफ्टर लगातार आते हैं, साथ में पाकिस्तानी लड़ाकू स्क्वाड्रनों की अग्रिम तैनाती होती है, एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय किए जाते हैं, गोला-बारूद डिपो में असामान्य गतिविधि दिखती है और पाकिस्तान सेना अपने पश्चिमी या पूर्वी मोर्चे पर सैनिकों की आवाजाही बढ़ाती है, तभी मामला सामान्य सैन्य रसद से आगे माना जाएगा। यहां महत्व इस बात में है कि पाकिस्तान तेजी से एक ऐसे सैन्य पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है, जिसमें चीनी हथियार और लॉजिस्टिक्स, तुर्की रक्षा तकनीक और नया सऊदी-तुर्की-पाक सामूहिक सुरक्षा ढांचा एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। भारत के लिए इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है, ‘नूर खान पर कौन-सा विमान उतरा?’ बल्कि यह है, ‘क्या पाकिस्तान अपनी २०२५ की सैन्य कमजोरियों को चीन और तुर्किये की मदद से इतनी तेजी से भर रहा है कि अगली टकराव की स्थिति में उसकी क्षमता पहले से अधिक मजबूत हो?’ यही सवाल इस ६० घंटे की रहस्यमय एयरलिफ्ट को सामान्य सैन्य आवाजाही से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।

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