-सरकार को मतदाता नहीं, माइंड कंट्रोल चाहिए?
-व्यंग्य में कहें तो सरकार को शायद ऐसा मतदाता सबसे मुफीद लगे, जिसकी आंखों पर अंधभक्ति का चश्मा हो, पेट्रोल महंगा हो तो राष्ट्रहित समझे, नौकरी न मिले तो पिछली सरकार याद करे और सवाल पूछने से पहले खुद से पूछे, ‘कहीं मैं दिमागी नक्सल तो नहीं?’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने १५ अगस्त २०२६ को लाल किले से अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसके बाद भाजपा नेताओं ने इसकी व्याख्या शुरू की। भाजपा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक बृजलाल ने कहा कि ऐसे लोग जंगलों में हथियार लेकर नहीं घूमते, बल्कि प्रोफेसर शिक्षक, बुद्धिजीवी, कवि, लेखक और गैर-सरकारी संगठनों के संचालक के रूप में समाज के बीच मौजूद होते हैं और युवाओं को प्रभावित करते हैं। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी की सफाई है कि ‘दिमागी नक्सल’ वे हैं, जो स्वयं हिंसा न करते हुए भी वैचारिक रूप से नक्सलवाद और हिंसा का समर्थन करते हैं। यह फर्क महत्वपूर्ण है, क्योंकि नक्सली हिंसा का समर्थन करना और सरकार की आलोचना करना एक बात नहीं है। लेकिन यहीं असली सवाल खड़ा होता है, आखिर सत्ता तय वैâसे करेगी कि कौन हिंसा का समर्थक है और कौन केवल सरकार से असहमत नागरिक?
आज शायद सरकार को वोट से ज्यादा चिंता मतदाता के दिमाग की है। वोट तो चुनाव के दिन पड़ता है, लेकिन दिमाग हर दिन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, सरकारी खर्च, चुनाव प्रक्रिया और संस्थाओं पर सवाल पूछ सकता है। सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक मतदाता वही होता है जो वोट देने के बाद पांच साल तक सवाल करना भूल जाए। और यहीं ‘माइंड कंट्रोल’ वाला राजनीतिक आरोप जन्म लेता है। पिछले बारह वर्षों में भाजपा की राजनीति में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व केंद्र में रहा है। बड़े प्रचार अभियान, सोशल मीडिया संदेश, लगातार दोहराए जाने वाले नारे, राष्ट्रवाद और भावनात्मक राजनीतिक मुद्दे उसकी चुनावी रणनीति के महत्वपूर्ण औजार रहे हैं।
‘वोट तो सरकार ले ही लेगी, उसके तरकश में बहुत से चुनावी तीर हैं’, यह एक राजनीतिक आरोप है, तथ्य नहीं। लेकिन लोकतंत्र के लिए उससे भी बड़ा खतरा तब होगा, जब सत्ता को भरोसा हो जाए कि वोट लेने से पहले मतदाता का दिमाग जीतना नहीं, उसे निष्क्रिय करना जरूरी है। लोकतंत्र की असली सुरक्षा ईवीएम में नहीं, जागरूक मतदाता के दिमाग में है। जिस दिन जनता ने सोचना छोड़ दिया, चुनाव तो होते रहेंगे, लोकतंत्र शायद नहीं बचेगा।
जो सवाल न करे-राष्ट्रभक्त।
जो सवाल करे-संदिग्ध।
जो तथ्य भी रख दे-‘दिमागी नक्सल’!
