-५ साल से अटके पुरस्कार
-मंत्री ‘दादा’ के पास समय नहीं
रामदिनेश यादव / मुंबई
भारतीय संस्कृति, परंपरा और संस्कृत भाषा के संरक्षण का दावा करने वाली भाजपा और महायुति सरकार के सामने अब संस्कृत के सम्मान का ही सवाल खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा संस्कृत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को दिया जाने वाला ‘महाकवि कालिदास संस्कृत साधना’ पुरस्कार वर्षों से लंबित है। हालत यह है कि २०२१ से २०२५ तक के पांच वर्षों के पुरस्कार अब तक नहीं दिए गए हैं, जबकि २०२६ के पुरस्कार की प्रक्रिया भी अभी तक शुरू नहीं हुई है। आश्चर्य तो तब होता है जब खुद को भारतीय संस्कृति और संस्कृत परंपरा का सबसे बड़ा पैरोकार बताने वाली भाजपा के वरिष्ठ मंत्री चंद्रकांत दादा पाटील के पास इस संबंध में बैठक लेने का भी समय नहीं है। अधिकारी तो अपने में व्यस्त नजर आ रहे हैं। सत्ता में आने के बाद संस्कृत विद्वानों और साधकों को सम्मान देने में सरकार की कथित उदासीनता उसके दावों पर अब सवाल उठने लगा है।
महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार ने वर्ष २०१२ में ‘महाकवि कालिदास संस्कृत साधना’ पुरस्कार शुरू किया था। शासन के निर्णय के अनुसार यह पुरस्कार हर वर्ष संस्कृत दिवस के अवसर पर दिया जाना चाहिए। लेकिन पुरस्कार शुरू होने के बाद से एक बार भी यह सम्मान निर्धारित समय पर नहीं दिया गया। २०१३ और २०१४ के पुरस्कार २०१५ में एक साथ दिए गए। इसके बाद २०१५ से २०२० तक के छह वर्षों के पुरस्कार भी २०२१ में एक साथ प्रदान किए गए। अब फिर २०२१ से २०२५ तक के पुरस्कार अटके हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर है। पुरस्कार के लिए विज्ञापन से लेकर आवेदन, छंटनी, चयन समिति की बैठक और मंत्री स्तर पर घोषणा तक पूरी प्रक्रिया के लिए सरकार ने बाकायदा समय-सारिणी तय की है, इसके बावजूद वर्षों तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती।
इस पुरस्कार के तहत विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले कुल आठ पुरस्कारार्थियों का चयन किया जाता है। प्रत्येक को २५ हजार रुपए नकद, प्रमाणपत्र, शॉल और श्रीफल दिया जाता है। हिंदू जनजागृति संस्था ने इस पुरस्कार की राशि को एक लाख रुपए करने की मांग की है। इस पर भी सरकार के मंत्री का विभाग हाथ खड़े कर रहा है। इतना ही नहीं, संस्थान में तामम रिक्त पदों और परस्पर अनुदान नहीं मिलने से हालात बदहाल हैं।
सम्मान की बारी आई तो मंत्री मौन
शिक्षा मंत्री दादा भुसे के पास राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों के लिए समय है, लेकिन संस्कृत साधकों के सम्मान की प्रक्रिया के लिए नहीं? क्या संस्कृत का सम्मान अब केवल मंचीय भाषणों और भारतीय संस्कृति के राजनीतिक गुणगान तक सिमट गया है? सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।
