शीतल अवस्थी
-श्राद्ध के साधन न हों तो उगते सूर्य को अर्घ्य देकर करें पूर्वजों का स्मरण; भावना और कृतज्ञता ही सबसे महत्वपूर्ण
पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व माना गया है। लेकिन धन, स्वास्थ्य, समय अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण यदि कोई व्यक्ति विधिपूर्वक श्राद्ध करने में असमर्थ हो तो वह सूर्यदेव के माध्यम से अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर सकता है।
सूर्य को प्रत्यक्ष देवता और समस्त जीवों का जीवनदाता माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि भावपूर्ण प्रार्थना के साथ सूर्य को अर्घ्य देने पर वे श्रद्धालु की भावना पितरों तक पहुंचाते हैं।
सूर्य को अर्घ्य देने की विधि
प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। तांबे के लोटे में साफ जल भरें। संभव हो तो उसमें काले तिल, लाल पुष्प अथवा अक्षत डालें।
पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। लोटे को दोनों हाथों से उठाकर धीरे-धीरे सूर्यदेव को जल अर्पित करें। जल की धारा से सूर्य को देखने के बजाय दृष्टि सामान्य रखें, क्योंकि सीधे सूर्य को देर तक देखना आंखों के लिए हानिकारक हो सकता है।
अर्घ्य देते समय यह मंत्र बोलें—
ॐ सूर्याय नमः।
इसके बाद अपने पूर्वजों का नाम और गोत्र स्मरण करें। जानकारी न हो तो ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को नमन करें।
करें यह भावपूर्ण प्रार्थना
“हे सूर्यदेव! धन, साधन अथवा परिस्थितियों के अभाव में मैं अपने पितरों का विधिवत श्राद्ध करने में असमर्थ हूं। कृपया मेरी श्रद्धा, प्रेम और प्रणाम मेरे पूर्वजों तक पहुंचाएं। उन्हें तृप्ति प्रदान करें और हमारे परिवार को सद्बुद्धि, स्वास्थ्य तथा सुख-शांति का आशीर्वाद दें।”
इसके बाद तीन बार हाथ जोड़कर प्रणाम करें। संभव हो तो किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, गाय को चारा दें अथवा पक्षियों के लिए अन्न-जल रखें।
सूर्य और पितरों का संबंध
वैदिक परंपरा में सूर्य को जीवों की आत्मशक्ति और कालचक्र का आधार माना गया है। सूर्यवंश और पितरों से जुड़े अनेक धार्मिक प्रसंगों में भी सूर्यदेव का उल्लेख मिलता है। इसी कारण पितृपक्ष में सूर्य को अर्घ्य देने और पितरों की शांति की प्रार्थना करने की परंपरा प्रचलित है।
श्राद्ध का वास्तविक अर्थ अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखना है। इसलिए किसी व्यक्ति को केवल आर्थिक अभाव के कारण दोषी महसूस करने की जरूरत नहीं। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता और पूर्वजों के सद्गुणों का पालन भी पितृभक्ति का श्रेष्ठ रूप है।
