राजन पारकर
महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता का खेल अब केवल चुनावी सभाओं, भाषणों और घोषणाओं तक सीमित नहीं दिखता। जनता के सामने विकास और सुशासन के दावे किए जाते हैं, लेकिन पुणे से जुड़ी बताई जा रही एक कथित ऑडियो क्लिप ने राजनीतिक गलियारों में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। क्लिप की प्रामाणिकता और बातचीत के संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि होना जरूरी है। ऐसे में सवाल है कि राजनीति जनता का विश्वास जीतने के लिए होती है या उसकी धारणा को अपने हिसाब से गढ़ने के लिए?
विकास का ढोल बड़ा, जवाबदेही का सवाल उससे भी बड़ा!
भाजपा विकास, पारदर्शिता और राष्ट्रहित की बातें करती है। ऐसे में यदि विरोधियों को बदनाम करने या उनके खिलाफ माहौल बनाने की कथित रणनीति के आरोप सामने आते हैं, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जनता ने सरकार चुनने का अधिकार दिया है, विरोधियों की छवि से खेलने का ठेका नहीं! चुनाव जनता के बीच लड़ा जाना चाहिए, उसके मन में भ्रम पैदा करके नहीं।
पांच सौ करोड़ की चर्चा, प्रमाण कहां?
इस विवाद से जुड़े विवरणों में कथित पांच सौ करोड़ रुपए के लेन-देन का दावा भी सामने आया है। लेकिन रकम का उल्लेख और लेन-देन का प्रमाण दो अलग बातें हैं। क्या कोई दस्तावेज या बैंकिंग रिकॉर्ड है? क्या किसी जांच एजेंसी ने इसकी पुष्टि की है? इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, ठोस सबूतों से मिलना चाहिए। आरोप निराधार हैं तो उन्हें फैलाने वालों की जवाबदेही तय हो और उनमें तथ्य हैं तो निष्पक्ष जांच हो।
वाढवण और बारसू पर भी सवाल
वाढवण बंदरगाह और बारसू रिफाइनरी जैसी परियोजनाओं पर स्थानीय लोगों की चिंताओं, पर्यावरण और रोजगार को लेकर बहस स्वाभाविक है। सरकार को विरोध करने वालों की आपत्तियों का तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए। असहमति को विकास-विरोधी बताकर खारिज करना उचित नहीं। आखिरकार, कथित ऑडियो क्लिप वास्तविक है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और भ्रामक है तो उसे पैâलाने वालों की जवाबदेही तय हो। सत्ता की असली ताकत सवाल दबाने में नहीं, उनका जवाब देने में है। लोकतंत्र में अंतिम पटकथा बंद कमरों में नहीं, जनता के विवेक से लिखी जाती है!
