मुख्यपृष्ठस्तंभ‘मक्का पैक्ट' के बाद  ‘बद्र एमओयू'... पाकिस्तान के नए रक्षा समझौते हिंदुस्थान...

‘मक्का पैक्ट’ के बाद  ‘बद्र एमओयू’… पाकिस्तान के नए रक्षा समझौते हिंदुस्थान के लिए सामरिक चुनौती!

एस रावत

हाल ही में पाकिस्तान, तुर्किए, कतर और इंडोनेशिया के बीच हुआ ‘बद्र एमओयू’ और इसके तहत इंडोनेशिया की भागीदारी भू-राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। आइए इस समझौते से जुड़े विभिन्न पहलुओं और हिंदुस्थान पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को कुछ समझने की कोशिश करते हैं।
अब ‘बद्र एमओयू’
इसी साल हुए ‘मक्का पैक्ट’ के बाद दोहा में हस्ताक्षरित यह नया ‘बद्र एमओयू’ मुख्य रूप से रक्षा तकनीक के विकास, सह-उत्पादन और सैन्य औद्योगिक सहयोग पर केंद्रित है, जिसके जरिए पाकिस्तान और उसके सहयोगी रक्षा क्षेत्र में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह महज मुस्लिम देशों से दोस्ती है या फिर कोई सामरिक रणनीति?
ऊपरी तौर पर इसे संसाधनों की पूरक क्षमताओं का इस्तेमाल बताया जा रहा है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह केवल सामान्य दोस्ती नहीं, बल्कि एक गहरी सामरिक रणनीति है। इसके माध्यम से पाकिस्तान अपनी सैन्य तकनीक के स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास कर रहा है। आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहे पाकिस्तान की इस पहल को रक्षा क्षेत्र में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने और तुर्किए की तकनीक व कतर के निवेश के सहारे एक बड़े रक्षा नेटवर्क का हिस्सा बनने की चाल के रूप में देखा जा रहा है।
इंडोनेशिया के चलते हिंदुस्थान की चिंताएं
हिंदुस्थान और इंडोनेशिया के बीच बेहद गहरे रणनीतिक संबंध हैं और हाल ही में दोनों देशों के बीच लगभग ५,९५३ करोड़ रुपए के रक्षा सौदों पर सहमति बनी है, जिसके तहत हिंदुस्थान जकार्ता को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्रॉ एयर-टू-एयर मिसाइल की आपूर्ति करेगा। ऐसे में इंडोनेशिया का पाकिस्तान और तुर्की के साथ इस समझौते में शामिल होना और पाकिस्तानी जेएफ-१७ विमानों में रुचि दिखाना नई दिल्ली में यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इससे संवेदनशील रक्षा तकनीक की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।
हिंदुस्थान के लिए खतरनाक गठबंधन?
विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी एमओयू को सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता। हिंदुस्थान के रक्षा निर्यात समझौतों में इंटेलेक्चुअल और डेटा सिक्योरिटी की बेहद सख्त शर्तें होती हैं, जिससे तकनीक के तीसरे देश तक पहुंचने की गुंजाइश नहीं होती। फिर भी, कूटनीतिक स्तर पर यह समझौता लंबी अवधि में हिंदुस्थान की सुरक्षा रणनीति के लिए एक अहम निगरानी का विषय जरूर रहेगा।

अन्य समाचार