-अक्टूबर में ही ४८ हजार करोड़ की निकासी!
-सालभर में ३ लाख करोड़ से ज्यादा की शुद्ध बिकवाली का आंकड़ा; महंगे कच्चे तेल, वैश्विक तनाव और कमजोर रुपये ने बढ़ाई चिंता
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली थमने का नाम नहीं ले रही है। अक्टूबर के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई ने भारतीय शेयरों से लगभग ४८,०५६ करोड़ की शुद्ध निकासी की है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष २०२६ में अब तक यह आंकड़ा लगभग ३.०८ लाख करोड़ पहुंच गया है। लगातार निकलती विदेशी पूंजी ने बाजार की स्थिरता, रुपये की स्थिति और निवेशकों के भरोसे को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे एक नहीं, कई कारण बताए जा रहे हैं। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में महंगा तेल आयात बिल बढ़ाने, महंगाई का दबाव पैदा करने और कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। दूसरी ओर, वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने पर विदेशी निवेशक अक्सर जोखिम कम करने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकालते हैं। डॉलर की मजबूती और रुपये में कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के प्रतिफल को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, विदेशी निवेशकों की बिकवाली का अर्थ यह नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था से उनका भरोसा पूरी तरह उठ गया है। शेयर बाजार में विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की रणनीतियां अलग-अलग हो सकती हैं। घरेलू निवेशकों की खरीदारी विदेशी बिकवाली के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित भी कर सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल छोटे निवेशकों के लिए है। विदेशी पूंजी की तेज निकासी से शेयरों की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। लेकिन किसी एक महीने की बिकवाली को बाजार के भविष्य का निश्चित संकेत मानना भी उचित नहीं होगा। सरकार और नियामकों के सामने चुनौती है कि वे पूंजी प्रवाह, रुपये की स्थिरता और वैश्विक जोखिमों पर नजर बनाए रखें। भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली कब थमेगी और क्या घरेलू निवेशक इस दबाव को संभाल पाएंगे?
रुपए को संभालने में रिजर्व बैंक के पसीने छूटे; डॉलर फिर `९५ के करीब!
भारतीय रुपए में हालिया सुधार के बावजूद विदेशी मुद्रा बाजार की चुनौतियां समाप्त नहीं हुई हैं। शुक्रवार, २३ अक्टूबर को रुपया ९४.९४ प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जबकि इससे पिछले सत्र में यह ९४.८३ पर था। अक्टूबर में अब तक रुपये में ०.९३ प्रतिशत सुधार हुआ है, लेकिन पश्चिम एशिया का तनाव, तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी पूंजी की निकासी उसकी मजबूती के रास्ते में बाधा बनी हुई हैं। मुद्रा बाजार में रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप के बावजूद रुपये की स्थिरता पर सवाल कायम हैं।
