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गजबे है : अरे मोरी मइया… अब विकास के लिए मुर्दे भी अंगूठा लगाएंगे!

उमा सिंह

इ तव गजबे है जी.., जिंदा आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटें और कागजों पर मुर्दों के अंगूठे लगाकर विकास की गाड़ी दौड़ा दी जाए। वाह रे विकास बाबू, अब तो आप यमराज के विभाग में भी अपनी पहुंच बना लिए हैं का? ओडिशा में अडानी समूह की बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर कांग्रेस नेता विक्रांत भूरिया ने गंभीर आरोप लगाए हैं। दावा है कि ६०० से ज्यादा ग्रामीणों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर और अंगूठों के निशान इस्तेमाल किए गए। इनमें मृत लोगों के नाम भी शामिल होने का आरोप है। कांग्रेस ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। आरोप सही साबित हुए तो समझिए, विकास का नया फॉर्मूला मिल गया, आदमी जिंदा हो या मर गया हो, कागज पर उसका अंगूठा होना ही चाहिए।
अब कोई सरकार से पूछे कि जब जिंदा आदिवासियों की आवाज सुनने में इतनी दिक्कत है, तो मुर्दों से सहमति लेने की इतनी जल्दी काहे है? क्या ग्रामसभा की बैठक में अब आत्माओं की भी हाजिरी लगेगी? मजेदार बात देखिए, जमीन आदिवासियों की, जंगल उनका, लेकिन विकास का हिसाब-किताब कोई और लिख रहा है। मुनाफे की मलाई किसी और की थाली में और अपनी जमीन बचाने की लड़ाई आदिवासियों के हिस्से में। भइया, विकास करना ही है तो जिंदा लोगों की सहमति लीजिए, मुर्दों की नहीं। क्योंकि खदानों से बॉक्साइट निकालने के लिए मशीनें चाहिए, मगर ग्रामसभा की मंजूरी के लिए फर्जी अंगूठे इस्तेमाल करने पड़े, तो समझ लीजिए कि मामला सिर्फ खनन का नहीं, लोकतंत्र की नींव का है।

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