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सड़क-वाहन की ‘वाट’ लगाने के बाद गडकरी का राजनीति से भर गया मन!

-बोले, अब ज्यादा काम नहीं कर सकता, नई पीढ़ी को मौका मिलना चाहिए
-ई-२०, टोल और सड़कों को लेकर पहले ही झेल रहे तीखी आलोचना
-सवाल, जब नीतियों का हिसाब देने का वक्त आया तो मंत्रीजी को क्यों याद आया, ‘खाली हाथ आए हैं, खाली हाथ जाना है’?

सामना संवाददाता / मुंबई

देश की सड़कों, टोल और ई-२० पेट्रोल को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने अब ऐसा बयान दिया है, जिसने उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा छेड़ दी है।
गडकरी ने नागपुर में एक कार्यक्रम में कहा कि वह अब पहले जितना काम नहीं कर सकते और नई पीढ़ी को अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने जीवन को लेकर यह भी कहा कि व्यक्ति ‘खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है।’
बयान आध्यात्मिक है, लेकिन इसका समय राजनीतिक है। क्योंकि यह वही दौर है जब गडकरी को अपनी मंत्रालयी उपलब्धियों से ज्यादा ई-२० पेट्रोल, टोल और सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर उठते सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
ई-२० ने गडकरी को सीधे निशाने पर ला दिया
ई-२० पेट्रोल को लेकर पिछले महीनों में वाहन मालिकों के बीच माइलेज और पुराने वाहनों की अनुकूलता को लेकर व्यापक बहस हुई। विरोध राजनीतिक स्तर तक पहुंचा और नागपुर में युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गडकरी के आवास की ओर मार्च करने का प्रयास किया। दिल्ली के परिवहन संगठनों ने भी विरोध की योजना बनाई, जबकि विपक्षी नेताओं ने गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री तक को हटाने की मांग की। सोशल मीडिया पर विवाद इतना बढ़ा कि गडकरी को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। मुंबई उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ प्रसारित कुछ अपमानजनक, कथित डीपफेक और मानहानिकारक सामग्री हटाने का आदेश दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने वैध आलोचना पर रोक नहीं लगाई, बल्कि आपत्तिजनक और मानहानिकारक सामग्री को लेकर राहत दी। यानी आलोचना और गाली में अंतर है, लेकिन सरकारी नीति पर सवाल पूछने का अधिकार जस का तस है।
सड़क पर गड्ढा, सोशल मीडिया पर गडकरी
गडकरी स्वयं हाल में कह चुके हैं कि पुणे-मुंबई एक्सप्रेसवे के एक हिस्से में नुकसान को लेकर उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, जबकि वह परियोजना उनके मंत्रालय की नहीं, बल्कि महाराष्ट्र सरकार की थी। उन्होंने अपने पुराने मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता का हवाला देकर कहा कि वह आज भी गड्ढामुक्त है। यह सफाई तथ्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। हर खराब सड़क का ठीकरा केंद्रीय सड़क मंत्री के सिर फोड़ना उचित नहीं। मगर उसी के साथ यह प्रश्न भी खत्म नहीं होता कि देश की राष्ट्रीय सड़क नीति, सड़क सुरक्षा और निर्माण गुणवत्ता की सर्वोच्च राजनीतिक जिम्मेदारी आखिर किस मंत्रालय की है? खुद गडकरी ने कुछ दिन पहले खराब विस्तृत परियोजना रिपोर्टों और निर्माण में समझौते को दुर्घटनाओं तथा आर्थिक नुकसान का कारण बताया था।
दुर्घटनाओं का आंकड़ा, खुद मंत्री को परेशान करता है
रविवार को ही गडकरी ने कहा कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं से आतंकवाद, दंगों, युद्ध और कोविड से भी अधिक मौतें होती हैं। उन्होंने कानून के प्रति भय और सम्मान की कमी को बड़ी वजह बताया। यहीं जनता का दूसरा सवाल बनता है, अगर सड़क दुर्घटनाएं इतनी भयावह हैं तो इतने वर्षों के मंत्रीकाल के बाद परिणाम का हिसाब कौन देगा?
सिर्फ चालक?
सिर्फ डीपीआर बनाने वाला सलाहकार?
सिर्फ ठेकेदार?
सिर्फ राज्य सरकार? या नीति बनाने वाली व्यवस्था भी?
‘अब नई पीढ़ी आए’, लेकिन पुरानी नीतियों का हिसाब?
गडकरी का नई पीढ़ी को मौका देने वाला बयान राजनीतिक संन्यास की औपचारिक घोषणा नहीं है। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि वे मंत्री पद छोड़ रहे हैं या अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसलिए ‘गडकरी राजनीति छोड़ रहे हैं’ कहना अभी तथ्य से आगे निकलना होगा। लेकिन राजनीतिक व्यंग्य का सवाल जरूर बनता है,जब वाहन मालिक ई-२० का हिसाब पूछ रहे हैं, सड़क उपयोगकर्ता टोल का हिसाब पूछ रहे हैं, दुर्घटनाओं पर परिवार जवाब मांग रहे हैं और खराब सड़कों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर घूम रही हैं, तभी मंत्रीजी को दर्शन याद आया, ‘खाली हाथ आए हैं, खाली हाथ जाना है।’ जनता शायद इसमें एक लाइन और जोड़ना चाहे, ‘मंत्रीजी, जाइए जरूर खाली हाथ… पर जाते-जाते नीतियों का हिसाब तो पूरा देते जाइए!’

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