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संपादकीय : देवता क्यों कुपित हुए?

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जिस उद्देश्य से सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी, उन राष्ट्रीय और सामाजिक कारणों को दरकिनार करने का काम पिछले कुछ समय से चल रहा है। इसके लिए राजनेता, भक्त और कॉर्पोरेट उद्योग जिम्मेदार हैं। सार्वजनिक गणेशोत्सवों से ‘प्रबोधन’ (जनजागरण) का आंदोलन पीछे छूट गया और स्पर्धा शुरू हो गई। उस स्पर्धा के कारण गणेश मंडलों के बीच विवाद पैदा हुए, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। गणेश जी का आधिकारिक आगमन १४ सितंबर को होनेवाला है, लेकिन मुंबई के ‘शाही’ गणपति का आगमन और उनके उत्सव पहले ही शुरू हो चुके हैं। उस आगमन के दौरान हुए एक हादसे से पूरी मुंबई मर्माहत है। भुलेश्वर में गणेश मूर्ति के आगमन जुलूस के दौरान मूर्ति का संतुलन बिगड़ गया। मूर्ति गिर पड़ी और उसमें भुलेश्वर सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल के अध्यक्ष संकेत नेवशे तथा पदाधिकारी बृजेश जोशी की मृत्यु हो गई। कुछ अन्य लोग घायल हो गए। विघ्नहर्ता के स्वागत के समय ही यह विघ्न आने से सार्वजनिक उत्सव मंडलों पर दुख का साया मंडरा गया। यह हादसा क्यों हुआ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? देवता क्यों कुपित हुए? इस पर मंथन जारी है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि खराब सड़कों और गड्ढों के कारण मूर्ति ले जा रहे ट्रक का संतुलन बिगड़ा और हादसा हुआ; वहीं यह निष्कर्ष भी सामने आया कि मूर्ति को पीछे से सहारा देने के लिए की गई वेल्डिंग टूटने से यह दुर्घटना हुई। निष्कर्ष चाहे जो भी हो, लेकिन मूर्ति ऊंची और अत्यधिक भारी होने के कारण हादसा हुआ, यह सच भक्तों और सार्वजनिक मंडलों को स्वीकार करना ही होगा। सार्वजनिक मंडलों के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृश्य-झांकियां पहले
आकर्षण का केंद्र
हुआ करती थीं। लोग इन झांकियों को देखने के लिए खिंचे चले आते थे। अब झांकियों की जगह अति-भव्य और ऊंची मूर्तियों ने ले ली है तथा ऊंची-ऊंची मूर्तियों की होड़ शुरू हो चुकी है। मुंबई की सड़कों पर ऐसी ऊंची गणेश मूर्तियों के आगमन और विसर्जन के समय दिक्कतें पैदा होती हैं। कई बार चौपाटी पर विसर्जन अटक जाता है और दूसरे दिन तक विसर्जन पूरा नहीं हो पाता। ऊंची गणेश मूर्तियों की जानलेवा होड़ ने कल भुलेश्वर में बलि ले ली, लेकिन ऐसे हादसे पहले भी हो चुके हैं। सच तो यह है कि १८ फीट से ऊंची मूर्ति न हो, यह फैसला २००४ के आस-पास जयंत सालगांवकर की अध्यक्षता वाली समिति ने लिया था। इस फैसले पर अब अमल नहीं होता और ऊंची मूर्तियों की प्रतिस्पर्धा आसमान छू रही है। किसी गगनचुंबी ‘टावर’ की तरह गणेश मूर्तियां बनाकर उन्हें मंडलों की प्रतिष्ठा का प्रतीक मानकर लाया जाता है। इसमें सरकार की कोई भूमिका है या नहीं? सार्वजनिक गणेशोत्सव एक भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक समारोह तो है ही, इस उत्सव के साथ स्वतंत्रता संग्राम की विरासत भी जुड़ी है। पूरी दुनिया से लोग इस अवसर पर मुंबई आते हैं। इसलिए हादसों को रोकने के लिए सरकार को पहल करके उत्सव मंडलों को महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश देने चाहिए और समन्वय स्थापित करना चाहिए; लेकिन इस उत्सव में राजनीतिक और आर्थिक साठ-गांठ जुड़ी हुई है। ‘लालबागचा राजा’ के दर्शन के लिए राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के ‘महानायक’ आते हैं। गृहमंत्री शाह आते हैं तो लालबाग का इलाका
दो-एक घंटे के लिए ‘सीलबंद’
कर दिया जाता है। ‘लालबागचा राजा’ का नियंत्रण अब कहा जाता है कि ‘अंबानी’ परिवार के पास है। इसे आस्था के रूप में देखें तो अब तुरंत बगल के प्रख्यात चिंचपोकली चिंतामणि गणेशोत्सव मंडल के साथ अडानी समूह ने आधिकारिक भागीदारी कर ली। चिंचपोकली का उत्सव १०७ साल पुराना है। यानी लोकमान्य द्वारा शुरू किए गए उत्सव पर अब उद्योगपतियों का कब्जा हो गया है। गणेशोत्सव अब मराठी मानुस के हाथ में नहीं बचा है। देवताओं को कॉर्पोरेट होड़ में घसीटने वाले मंडलों को सार्वजनिक गणेशोत्सव आंदोलन का इतिहास समझना चाहिए। लोकमान्य के ‘सार्वजनिक उत्सव’ के विचारों को तिलांजलि देनेवाले तौर-तरीकों को हिंदुत्व के नाम पर चलाना यानी कॉर्पोरेट बाजार में हिंदुत्व की नीलामी करने जैसा है। सार्वजनिक गणेशोत्सव के बारे में बोलते हुए लोकमान्य तिलक ने कहा था कि ‘राष्ट्र के अभ्युदय के लिए ऐसे उत्सवों का होना आवश्यक है। किसी भी समाज में एकता की वृद्धि के जो अनेक साधन होते हैं, उनमें से एक पूज्य देवता का होना भी एक कारण है।’ लेकिन तिलक के इस विचार को पीछे छोड़कर आज की उत्सवी पीढ़ी एक अलग ही दिशा में निकल पड़ी है। फिर भी, सार्वजनिक गणेशोत्सव निर्विघ्न संपन्न हो, यह महत्वपूर्ण है। ऐसे समय में भुलेश्वर सार्वजनिक उत्सव मंडल की भव्य मूर्ति गिरकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इसी सरकार के कार्यकाल में मालवण में छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य प्रतिमा गिरी थी और अब श्री गणेश मूर्ति गिर पड़ी। विघ्नहर्ता… आप क्यों कुपित हुए? चिंता न करें, भक्तों को सद्बुद्धि आएगी और सब कुछ कुशल-मंगल होगा!

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