-राम के चंदे की रखवाली फेल, चिंता यह कि खबर अखिलेश तक कैसे पहुंची
सामना संवाददाता / अयोध्या
राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी हुई। स्वाभाविक तौर पर पहला सवाल होना चाहिए था, चोर कौन है, रकम कितनी गई, सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी थी और निगरानी व्यवस्था क्यों फेल हुई? लेकिन चंपत राय की कथित गोपनीय डायरी से जो तस्वीर उभरती है, उसमें एक दूसरी बेचैनी ज्यादा दिखाई देती है।
अखिलेश यादव तक अंदर की बात पहुंची कैसे और ‘हमारे बीच भेदिया कौन है?’ यहीं पूरा मामला भाजपा और उससे जुड़े तंत्र की राजनीतिक कार्यशैली पर तीखा सवाल खड़ा करता है।
अपराध से ज्यादा चिंता अपराध के सार्वजनिक हो जाने की
अगर श्रद्धालुओं के चढ़ावे में सेंध लगी तो प्राथमिकता चोरी की जड़ तक पहुंचने की होनी चाहिए थी। लेकिन जब व्यवस्था की ऊर्जा यह पता लगाने में लगने लगे कि सूचना विपक्ष तक किसने पहुंचाई, तो संदेश खतरनाक हो जाता है, अपराध से ज्यादा चिंता अपराध के सार्वजनिक हो जाने की है।
यही बीमारी सत्ता में लंबे समय तक रहने वाले तंत्र को पकड़ती है। गड़बड़ी हो जाए तो पहले सुधार नहीं, ‘लीक किसने किया?’ खोजा जाता है। सवाल उठे तो जवाब नहीं, सवाल उठाने वाले की नीयत जांची जाती है। दस्तावेज बाहर आए तो दस्तावेज में लिखी बातों से पहले यह देखा जाता है कि दस्तावेज बाहर किसने पहुंचाया।
राम मंदिर किसी पार्टी कार्यालय का कैश काउंटर नहीं है। वहां आया पैसा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का पैसा है। उसकी एक-एक पाई का हिसाब सार्वजनिक कसौटी पर होना चाहिए। यदि चोरी हुई तो चोर पकड़िए। यदि निगरानी फेल हुई तो जिम्मेदार तय कीजिए। यदि बड़े पदों पर बैठे लोगों से चूक हुई तो उनसे जवाब मांगिए। लेकिन अगर सबसे बड़ा सवाल यह बन जाए कि ‘अखिलेश को किसने बताया?’ तो जनता भी पूछेगी।
आपको ज्यादा डर चढ़ावा चोरी से है या चोरी की खबर बाहर आने से?
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे कड़वा व्यंग्य है, राम के पैसे में सेंध लगी, मगर सत्ता की निगाह तिजोरी से ज्यादा उस सुराख पर टिक गई, जहां से सच बाहर निकल गया।
