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उत्तर की बात : ‘सिर्फ चेहरे बदलने से तस्वीर नहीं बदलेगी!.. मायावती ने योगी सरकार को दिखाया आईना

रोहित माहेश्वरी, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी हलचल तेज है। भाजपा ने २०२७ के विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की है, लेकिन विपक्ष इसे केवल चुनावी गणित मान रहा है। समाजवादी पार्टी के बाद अब बसपा प्रमुख मायावती ने भी इस विस्तार पर अपनी प्रतिक्रिया देकर सरकार को अप्रत्यक्ष संदेश दिया है। मायावती का बयान भले ही संतुलित दिखाई देता हो, लेकिन उसके भीतर सरकार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी छिपी है। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल का विस्तार किसी भी सत्ताधारी दल का आंतरिक मामला होता है, इसलिए उस पर सीधी टिप्पणी उचित नहीं होगी। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि किसी भी विस्तार का असली मूल्यांकन जनता के हितों से होगा। यदि गरीबों, किसानों, मजदूरों, युवाओं और महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं दिखता, तो जनता इसे केवल राजनीतिक जुगाड़ और सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ मानेगी। आज उत्तर प्रदेश की जनता केवल राजनीतिक संतुलन नहीं, बल्कि जमीन पर काम और परिणाम देखना चाहती है। बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था और किसानों की समस्याएं अब भी बड़े मुद्दे बने हुए हैं। इसलिए सरकार के लिए असली परीक्षा यह होगी कि नए मंत्री अपने विभागों में कितना प्रभावी काम कर पाते हैं।
समान अवसर की लड़ाई या सियासी शक्ति प्रदर्शन?
लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर सिराथू से विधायक और अपना दल कमेरावादी की नेता पल्लवी पटेल का प्रदर्शन केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि यह सामाजिक न्याय और उच्च शिक्षा में समान अवसरों की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है। पल्लवी पटेल ने यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन २०२६ को लागू करने की मांग को लेकर हजारों कार्यकर्ताओं के साथ रेल रोक आंदोलन किया, जिसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति भी बनी। दरअसल, यूजीसी के इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में जातीय, लैंगिक और सामाजिक भेदभाव की शिकायतों के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार करना था। रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों के बाद इस तरह के नियमों की मांग तेज हुई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाई हुई है और इन्हें ‘अस्पष्ट’ बताते हुए विस्तृत सुनवाई की बात कही है।
यूपी की राजनीति में पल्लवी पटेल इस मुद्दे को पिछड़े, दलित और वंचित समाज के अधिकारों से जोड़कर देख रही हैं। ऐसे समय में जब अधिकांश दल इस विवाद पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं, पल्लवी का सड़क पर उतरना यह संकेत देता है कि २०२७ के चुनाव से पहले सामाजिक न्याय की राजनीति फिर से गर्माने वाली है।
हंसी-मजाक में बड़ा सियासी संदेश
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने २०२७ के यूपी चुनाव को लेकर २०१२ वाला ‘फॉर्मूला’ दोहराने की बात कही है। उन्होंने प्रेस कॉन्प्रâेंस में मजाकिया अंदाज में एक पंडित और ज्योतिषीय सलाह का जिक्र करते हुए दावा किया कि उसी रणनीति से फिर सपा सरकार बनेगी। यह बयान केवल हास्य नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं में भरोसा जगाने की कोशिश भी है। हालांकि, २०२७ का चुनाव केवल प्रतीकों और दावों से नहीं जीता जाएगा। बेरोजगारी, किसानों, कानून व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर जनता ठोस विकल्प और स्पष्ट विजन भी चाहती है।

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