मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : पुणे के ‘डीजे' वाले बाबू

संपादकीय : पुणे के ‘डीजे’ वाले बाबू

पुणे की जनता गणेशोत्सव में होनेवाले शोर-शराबे के खिलाफ सड़कों पर उतर आई है। गणेशोत्सव की उज्ज्वल परंपरा ‘डीजे’ के कानफोड़ू शोर में नष्ट हो रही है। ‘डीजे’ पर प्रतिबंध के लिए पुणेवासियों द्वारा शुरू किया गया आंदोलन महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है। पुणेवासियों ने तो बस शुरुआत की है। जिस तरह लाउडस्पीकर से होने वाली अजान/बांग से सबको तकलीफ होती है, ठीक वैसी ही तकलीफ गणेशोत्सव में डीजे के धमाकेदार शोर से भी होती है। ‘गणेशोत्सव भक्ति का है या इस शोर-शराबे और ध्वनि प्रदूषण का?’, यह सवाल पुणे के लोगों ने पूछा है। रविवार को पुणे के डेक्कन इलाके स्थित गुडलक चौक और अभिनव चौक में प्रदर्शन हुआ, जिसमें हजारों पुणेवासी स्वत:स्फूर्त रूप से एकत्र हुए। गुडलक चौक ने ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलन जैसा रूप ले लिया। डीजे के धमाकों से पुणेवासियों के कान के पर्दे खराब हो चुके हैं और यह कानफोड़ू शोर कोई हिंदुत्व या सार्वजनिक गणेशोत्सव नहीं है। लोकमान्य तिलक ने राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य से सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय जागृति और लोकरंजन, मनोरंजन के माध्यम से शिक्षा जैसे सार्वजनिक गणेशोत्सव के उद्देश्य आगे बढ़ते रहे। सार्वजनिक उत्सवों में समय के साथ बदलाव होते रहे, लेकिन इसकी पवित्रता को कभी कम नहीं होने दिया गया। महाराष्ट्र के
सांस्कृतिक जीवन पर
नि:संदेह इस उत्सव ने अपनी छाप छोड़ी है। जन-जागृति और मनोरंजन की तरह ही कई सार्वजनिक मंडल दानपेटी में जमा राशि से जनसेवा करते हैं। गणेशोत्सव का मंच कभी कई कलाकारों के लिए एक अधिकारपूर्वक मिलनेवाला मंच हुआ करता था। क्या अब वह वैसा रहा है? भक्ति गीत, व्याख्यान, नाट्य प्रस्तुतियां, वाद-विवाद प्रतियोगिताएं, फैंसी ड्रेस और संगीत कुर्सी जैसे कार्यक्रम गणेशोत्सव के दौरान होते थे। उनकी जगह अब ‘डीजे वाले बाबुओं’ ने ले ली है और मंडलों के बीच कानफोड़ू आवाजों की स्पर्धाएं शुरू हो गई हैं। चंदे के लिए जबरदस्ती करना, कर्ण कर्कश स्वर में गाने बजाना और मंच पर बाहरी कलाकारों के अश्लील ठुमके लगवाना सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा नहीं है। अब तो मुंबई-पुणे के बड़े उद्योगपति प्रमुख सार्वजनिक उत्सवों में करोड़ों का दान देकर त्योहारों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहे हैं। पुणे के गणेशोत्सव का पिछले कुछ समय का चित्र विकृत रहा है। इस दौरान पुणे अधिक व्यस्त और भीड़भाड़ वाला होता है। पुणे में रिश्तेदारों का तांता लगा रहता है। विदेश में रहने वाले पुणेवासी भी अपने शहर उत्सव के लिए आते हैं। वे मंडलों के विभिन्न पंडालों में जाते हैं, जहां वे धार्मिक और आध्यात्मिक माहौल चाहते हैं। उत्सव के चलते शहर में यातायात ठप हो जाता है, उसे भी बर्दाश्त कर लिया जाता है; लेकिन जब पुणेवासी कहते हैं कि ‘डीजे वाले बाबुओं’ का यह अत्याचार बंद करो, तो उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए।
गुडलक चौक में बुलंद आवाज
गुडलक चौक पर इकट्ठे हुए सैकड़ों पुणेवासियों ने नारे लगाए: ‘डीजे बंद करो, पुणे की संस्कृति बचाओ। शोर नहीं चाहिए, आरती सुनने दो।’ पुणेवासियों के इस आंदोलन को कल ‘हिंदुत्व विरोधी’ ठहरा दिया जाएगा। गुडलक चौक पर जमा हुए लोगों को ‘दिमागी नक्सल’ बताकर दुष्प्रचार किया जाएगा, क्योंकि इन दिनों हिंदुत्व और संस्कृति को विकृत मोड़ देने का काम जोर-शोर से चल रहा है। गुडलक चौक के डीजे-विरोधी आंदोलन को विदेशी धन मिलने की बयानबाजी करने में भी ये लोग पीछे नहीं हटेंगे। महाराष्ट्र के समाज सुधारक और प्रगतिशील नेता पुणे में ही जन्मे और उन्होंने सामाजिक आंदोलनों को दिशा दी। तिलक द्वारा शुरू किया गया सार्वजनिक गणेशोत्सव सामाजिक एकजुटता का ही एक आंदोलन था। अब इस आंदोलन का रूप ‘कर्कश डीजे’ में बदल गया है। फिर भी, अच्छी बात यह है कि पुणे के गणेशोत्सव की पारंपरिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए पुण्यनगरी के दो सौ से अधिक गणेश मंडलों ने इस साल के गणेशोत्सव को पूरी तरह ‘डीजे-मुक्त’ रखने और पारंपरिक ढोल-ताशे, बैंड तथा मराठी सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्राथमिकता देने की घोषणा की है। इनका नेतृत्व श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल कर रहा है, जो नि:संदेह प्रशंसा का पात्र है। यह इस बात का प्रमाण है कि डीजे वाले बाबुओं के खिलाफ पुणेवासियों की आवाज बुलंद है!

अन्य समाचार