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अब ई-२० के खिलाफ जेन-एक्स सड़कों पर…गन्ने की माला, गडकरी के मुखौटे और स्ट्रेचर पर ‘बीमार इंजन’… युवा बोले, माइलेज घटा, पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ, फिर उपभोक्ता को फायदा कहां?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

ई-२० पेट्रोल को लेकर उठ रही नाराजगी अब सोशल मीडिया की शिकायतों से निकलकर सड़क पर पहुंच गई है। दिल्ली में युवाओं के एक समूह ने अनोखे अंदाज में विरोध करते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के मुखौटे पहने, गन्ने की मालाएं डालीं और एक वाहन के इंजन को स्ट्रेचर पर रखकर ‘बीमार’ दिखाया। प्रदर्शनकारियों का संदेश साफ था, ई-२० नीति पर उपभोक्ताओं की आपत्तियों को सरकार गंभीरता से सुने।
२० अगस्त को सोशल मीडिया पर सामने आई इस रील में प्रदर्शनकारी ट्रैफिक के बीच नारे लगाते और वाहन चालकों से बातचीत करते दिखाई देते हैं। उनके हाथों में गन्ने और अंत में ‘ई-२० रोल बैक’ का बैनर दिखाई देता है। बैनर पर चार शिकायतें प्रमुख हैं, इंजन पर असर, माइलेज में गिरावट, कीमत में राहत न मिलना और उपभोक्ता को विकल्प न दिया जाना।
प्रदर्शन का सबसे तीखा दृश्य स्ट्रेचर पर रखा इंजन है। युवाओं ने इसे प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि ई-२० के इस्तेमाल से वाहनों के इंजन पर असर पड़ रहा है। सड़क पर उतरे युवाओं का कहना है कि अगर एथेनॉल मिश्रण से देश को आयात में बचत होती है, तो वाहन मालिक को उसका सीधा लाभ क्यों नहीं दिखाई देता? अगर माइलेज कुछ कम होता है और पेट्रोल की कीमत लगभग वही रहती है, तो अतिरिक्त खर्च आखिर कौन वहन कर रहा है?
-गन्ने की माला, स्ट्रेचर पर ‘दम तोड़ता इंजन’
-दिल्ली की सड़क पर ई-२० के खिलाफ अनोखा प्रदर्शन
-स्ट्रेचर पर इंजन लेकर निकले युवा, सरकार से पूछा, देश की बचत ठीक, हमारी जेब का क्या?
ई-२० पेट्रोल को लेकर वाहन मालिकों में चल रही बहस अब सड़क पर उतर रही है। दिल्ली में युवा प्रदर्शनकारी ट्रैफिक के बीच कार चालकों तक पहुंचकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि २० प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों का माइलेज घट रहा है और पुराने इंजनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
सबसे तीखा प्रतीक स्ट्रेचर पर रखा ‘बीमार इंजन’ है। संदेश साफ है, प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ई-२० वाहन के इंजन की सेहत बिगाड़ रहा है। वीडियो के अंत में बैनर पर चार सवाल उभरते हैं, इंजन खराब हो रहा है, माइलेज कम हो रहा है, पेट्रोल की कीमत में बचत नहीं मिल रही और उपभोक्ता को दूसरा विकल्प नहीं दिया जा रहा।
सरकार कहती है व्यापक इंजन फेल होने का प्रमाण नहीं
इन आरोपों पर सरकार का पक्ष बिल्कुल अलग है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने ३० जुलाई २०२६ को कहा कि ई-१५ से अधिक मिश्रण साढ़े तीन साल और ई-१९/ई-२० ढाई साल से व्यापक इस्तेमाल में है और अब तक एथेनॉल मिश्रण के कारण बड़े पैमाने पर इंजन फेल होने या वाहनों के खराब होने का सत्यापित प्रमाण सामने नहीं आया है। एआरएआई का कहना है कि ई-२० के प्रभाव को जांचने के लिए बीएस-३, बीएस-४ और बीएस-६ दोपहिया तथा चारपहिया वाहनों पर र्इंधन दक्षता, उत्सर्जन, इंजन टिकाऊपन और सामग्री अनुकूलता जैसे परीक्षण किए गए हैं। जुलाई में एआरएआई ने कहा कि ई-२० अनुकूल वाहनों पर ४० हजार से ६० हजार किलोमीटर तक परीक्षण किए गए और र्इंधन दक्षता पर प्रभाव सीमित पाया गया। यहीं असली बहस शुरू होती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि ई-२० से वाहन तत्काल खराब होता है या नहीं। उपभोक्ता यह पूछ रहा है कि यदि एथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम है और माइलेज में कुछ कमी संभव है, तो उसकी आर्थिक भरपाई कहां है? क्या ई-२० पेट्रोल की खुदरा कीमत में ऐसा अंतर है जिससे अतिरिक्त र्इंधन खपत का खर्च निकल सके?
आयात बचत बनाम उपभोक्ता की जेब
सरकार ई-२० को देश की ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात में कमी और किसानों की आय से जोड़ती है। सरकार के अनुसार, एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का उद्देश्य विदेशी तेल पर निर्भरता घटाना और घरेलू कृषि आधारित र्इंधन उत्पादन बढ़ाना है, लेकिन दिल्ली का यह प्रदर्शन सरकार के सामने एक दूसरा सवाल रखता है, राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली बचत का लाभ वाहन मालिक को प्रत्यक्ष रूप से कितना मिल रहा है? यही वजह है कि ई-२० की लड़ाई अब केवल प्रयोगशाला के आंकड़ों की नहीं रही। यह उपभोक्ता की जेब, पुराने वाहनों की अनुकूलता, पेट्रोल पंप पर विकल्प और नीति लागू करने की गति का सवाल बनती जा रही है।

सोशल मीडिया पर फूटा ई-२० का गुस्सा, खराब गाड़ियों के वीडियो वायरल
ई-२० पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर नाराजगी तेजी से फैल रही है। एक वायरल संकलन वीडियो में पहले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का वह बयान दिखाया गया है, जिसमें वे ई-२० से नुकसान की आशंका को खारिज करते हैं। इसके तुरंत बाद अलग-अलग वाहन मालिकों के वीडियो जोड़े गए हैं, जिनमें स्कूटर, मोटरसाइकिल और कारों के स्टार्ट न होने, इंजन चेतावनी लाइट जलने और बीच रास्ते में वाहन बंद होने जैसी शिकायतें दिखाई गई हैं। एक वीडियो में पेट्रोल पंप पर बहस होती दिखती है, दूसरे में नई स्विफ्ट स्टार्ट नहीं हो रही, जबकि कुछ बाइक सवार रात में बंद पड़े वाहन को धक्का देते दिखाई देते हैं। एक सिख वाहन मालिक सवाल करता है कि यदि इंजन खराब हो गया तो मरम्मत का खर्च कौन देगा, जबकि उसकी ईएमआई अब भी जारी है। हालांकि, इन वायरल वीडियो से यह स्वत: सिद्ध नहीं होता कि हर खराबी का कारण ई-२० ही है। फिर भी इनका तेजी से फैलना यह दिखाता है कि वाहन मालिकों में माइलेज, इंजन अनुकूलता और मरम्मत लागत को लेकर अविश्वास बढ़ रहा है। यही वजह है कि #E20Scam और #RollbackE20 जैसे हैशटैग इस बहस को और तेज कर रहे हैं।
ई-२० क्या है?
ई-२० पेट्रोल में लगभग २० प्रतिशत एथेनॉल और शेष पेट्रोल होता है। भारत ने एथेनॉल मिश्रण को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, औसत मिश्रण २०२२-२३ में करीब १२ प्रतिशत, २०२३-२४ में १४.६ प्रतिशत और २०२४-२५ में लगभग १९.२ प्रतिशत तक पहुंच गया था।
क्या सचमुच माइलेज घटता है?
एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर कम ऊर्जा होती है, इसलिए माइलेज में भारी कमी तकनीकी रूप से संभव है। वास्तविक असर वाहन के इंजन, उसकी वैâलिब्रेशन और ई-२० अनुकूलता पर निर्भर करता है। सरकार और एआरएआई का दावा है कि अनुकूल वाहनों में प्रभाव सीमित है।
सबसे बड़ा उपभोक्ता सवाल
यदि पेट्रोल पंप पर मुख्यत: ई-२० ही उपलब्ध हो और किसी पुराने वाहन का मालिक ई-१० लेना चाहे तो उसके पास कितना वास्तविक विकल्प है? यही मुद्दा प्रदर्शनकारियों के बैनर में प्रमुखता से उठाया गया है।
प्रदर्शनकारियों के चार सवाल
-इंजन पर असर क्यों?
– माइलेज क्यों घट रहा?
– पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं?
– ई-१० या दूसरे विकल्प का अधिकार क्यों नहीं?
सरकार का जवाब
सरकार का कहना है कि ई-२० ऊर्जा सुरक्षा, आयात में कमी और किसान आय के लिए जरूरी है तथा ई-२० अनुकूल वाहनों में बड़े नुकसान का प्रमाण नहीं मिला है।
असली टकराव
सरकार राष्ट्रीय बचत गिनाती है, जबकि वाहन मालिक अपनी प्रति किलोमीटर लागत देख रहा है। आने वाली बहस इसी अंतर पर टिक सकती है।

ई-२० के खिलाफ फूटा वाहन मालिकों का गुस्सा
ई-२० पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर वाहन मालिकों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है। वायरल वीडियो में कहीं नई कार स्टार्ट नहीं हो रही, कहीं बाइक बीच रास्ते में बंद पड़ी है, तो कहीं इंजन चेतावनी लाइट जल रही है। कई वाहन मालिक सीधे सरकार और नितिन गडकरी पर सवाल उठा रहे हैं कि जब वाहन ईएमआई पर खरीदे गए हैं और इंजन खराब हो रहे हैं, तो मरम्मत का खर्च कौन देगा? एक वीडियो में वाहन मालिक कहता है, ‘ईएमआई अभी भी चल रही है, इंजन गया तो पैसे कौन देगा?’ दूसरे वीडियो में बाइक सवार रात में वाहन को धक्का देता दिख रहा है। कई लोग माइलेज गिरने, इंजन खराब होने और ई-२० का विकल्प न मिलने की शिकायत कर रहे हैं। अब सवाल सिर्फ सोशल मीडिया का नहीं है। सड़क पर प्रदर्शन, आर्थिक सवाल और लगातार सामने आ रहे वाहन खराब होने के वीडियो मिलकर ई-२० के खिलाफ बड़े उपभोक्ता असंतोष का रूप लेते दिखाई दे रहे हैं।
पूनावाला का सवाल, ई-२० सस्ता नहीं, फिर फायदा किसका?
राजनीतिक टिप्पणीकार तहसीन पूनावाला ने ई-२० पेट्रोल को लेकर सरकार के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि उपभोक्ता को २० प्रतिशत एथेनॉल मिला पेट्रोल दिया जा रहा है, तो उसे कीमत में स्पष्ट राहत क्यों नहीं मिल रही। उन्होंने नितिन गडकरी के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें कहा गया कि जिसे ई-२० नहीं चाहिए, वह अधिक कीमत देकर शुद्ध पेट्रोल खरीद सकता है। पूनावाला ने पेट्रोल की कीमत का हिसाब दिखाते हुए दावा किया कि कच्चे तेल से तैयार पेट्रोल का मूल मूल्य करीब ३२-३३ रुपए प्रति लीटर पड़ता है, जबकि एथेनॉल की सरकारी खरीद कीमत लगभग ६५ से ७२ रुपये प्रति लीटर तक है। उनका तर्क है कि जब एथेनॉल स्वयं महंगा है तो मिश्रण से उपभोक्ता का पेट्रोल सस्ता वैâसे हो रहा है? उन्होंने चीनी मिलों, डिस्टिलरियों और एथेनॉल निर्माताओं को मिलने वाली सरकारी वित्तीय सहायता का भी उल्लेख किया और सवाल उठाया कि इस नीति का वास्तविक आर्थिक लाभ किसे मिल रहा है। पूनावाला ने गडकरी के परिवार से जुड़े कारोबारी हितों को लेकर भी आरोप दोहराए, हालांकि ऐसे आरोपों को स्वतंत्र प्रमाण के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। उनका केंद्रीय सवाल है, माइलेज घटे, कीमत न घटे और विकल्प भी न मिले, तो ई-२० उपभोक्ता के हित में कैसे है?
सरकार का अगला पड़ाव, १०० प्रतिशत इथेनॉल?
फाइल पर हस्ताक्षर अपने, विवाद बढ़ा तो जिम्मेदारी पेट्रोलियम मंत्रालय की?
जून में नितिन गडकरी ने गर्व से कहा था कि उन्होंने १०० प्रतिशत एथेनॉल को वाहनों में कानूनी मान्यता देने वाले नियमों की फाइल पर रात ८ बजे हस्ताक्षर किए। इससे पहले वर्षों तक वे फ्लेक्स-फ्यूल, E१०० और पेट्रोल को एथेनॉल से बदलने के सबसे बड़े पैरोकार रहे। लेकिन E२० को लेकर वाहन मालिकों का गुस्सा बढ़ा तो मुंबई हाई कोर्ट में उनके मुकदमे का तर्क सामने आया कि E२० नीति सड़क परिवहन मंत्रालय की नहीं, पेट्रोलियम मंत्रालय की है। तकनीकी रूप से दोनों मंत्रालयों की जिम्मेदारियां अलग हैं, पेट्रोलियम मंत्रालय र्इंधन मिश्रण और आपूर्ति देखता है, जबकि गडकरी का मंत्रालय वाहनों और वैकल्पिक र्इंधन के तकनीकी-कानूनी मानक तय करता है। मगर सवाल राजनीतिक है: जब एथेनॉल की उपलब्धियों का श्रेय लिया जा रहा था तब ‘मैंने फाइल साइन की’, और जब E२० विवाद में घिरा तो जिम्मेदारी केवल पेट्रोलियम मंत्रालय की वैâसे हो गई?
कभी कहा था, १५ रुपए लीटर मिलेगा पेट्रोल
नितिन गडकरी का जुलाई २०२३ का बयान अब ई-२० विवाद के बीच फिर चर्चा में है। राजस्थान के प्रतापगढ़ में उन्होंने कहा था कि यदि ६० प्रतिशत एथेनॉल और ४० प्रतिशत बिजली का औसत इस्तेमाल किया जाए तो पेट्रोल १५ रुपए प्रति लीटर के भाव से मिलेगा और जनता को फायदा होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि इससे प्रदूषण और तेल आयात दोनों घटेंगे तथा किसानों को लाभ मिलेगा। अब आलोचक इसी पुराने बयान को सामने रखकर पूछ रहे हैं, जब एथेनॉल के सहारे १५ रु. लीटर पेट्रोल देने की बात कही गई थी, तो आज एथेनॉल-मुक्त पेट्रोल चाहने वाले उपभोक्ता के सामने १६८ रु.प्रति लीटर जैसे महंगे विकल्प की चर्चा क्यों हो रही है? यही विरोधाभास ई-२० को लेकर सोशल मीडिया के गुस्से को और हवा दे रहा है।
सवाल पूछो तो मंत्री बदल जाता है!
ई-२० पेट्रोल पर बढ़ते विवाद के बीच कांग्रेस ने १८ जुलाई को एक स्प्लिट-स्क्रीन वीडियो जारी कर सरकार पर जिम्मेदारी टालने का आरोप लगाया। वीडियो के ऊपरी हिस्से में नितिन गडकरी और निचले हिस्से में शिवराज सिंह चौहान दिखाई देते हैं। स्क्रीन पर तंज है, ‘हरदीप पुरी से पूछो… गडकरी जी से पूछो।’ कांग्रेस का निशाना इसी बात पर है कि ई-२० को लेकर माइलेज, इंजन और कीमत पर सवाल उठते ही जिम्मेदारी एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय की ओर जाती दिखाई देती है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की ओर इशारा करते दिखते हैं, जबकि एथेनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल के सबसे मुखर पैरोकारों में रहे गडकरी भी ई-२० नीति की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी पेट्रोलियम मंत्रालय की बताते रहे हैं।

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