मुख्यपृष्ठनए समाचार५ सितंबर से पहले दबाव में सरकार!

५ सितंबर से पहले दबाव में सरकार!

 -छात्रों के मुकदमे रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा केंद्र
-जिस मांग पर हफ्तों टालमटोल, आंदोलन करीब आते ही अनुच्छेद १४२ की गुहार

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

पांच सितंबर को प्रस्तावित युवाओं के बड़े प्रदर्शन से ठीक पहले केंद्र सरकार ने छात्र आंदोलनकारियों पर दर्ज एफआईआर समाप्त कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मामला तत्काल उठाते हुए कहा कि सरकार छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे रद्द कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद १४२ का सहारा चाहती है।
राजनीतिक सवाल अब यह उठ रहा है कि जिस मुद्दे पर पिछले कई सप्ताह से समाधान नहीं निकला, उस पर पांच सितंबर के प्रदर्शन से महज कुछ दिन पहले सरकार इतनी सक्रिय क्यों हो गई?
कॉकरेच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने पांच सितंबर को दिल्ली में बड़े मार्च की घोषणा की है। संगठन का आरोप है कि जुलाई के आंदोलन के दौरान युवाओं से किए गए वादों में से कई पूरे नहीं हुए और प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर भी समाप्त नहीं की गर्इं।
सरकार की तरफ से सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि अदालत ने मामले की सुनवाई १ सितंबर को करने पर सहमति जताई है। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा कि छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामलों को खत्म करने के लिए अनुच्छेद १४२ का इस्तेमाल किया जाए। मुख्य न्यायाधीश ने भी संकेत दिया कि यदि संबंधित पक्ष समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो अदालत को कठिनाई नहीं होगी।
इससे पहले १८ अगस्त को भी सुप्रीम कोर्ट हजारों छात्रों के भविष्य को देखते हुए एफआईआर रद्द करने की संभावना जता चुका था। हालांकि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस राहत से अलग रखने की बात कही गई थी।
मार्च रोकने से कोर्ट का इनकार
इसी बीच पांच सितंबर के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग भी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। याचिका में दिल्ली की कानून-व्यवस्था और आगामी ब्रिक्स सम्मेलन का हवाला दिया गया, लेकिन अदालत ने तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने साफ किया कि पहले से यह मान लेने का कोई आधार नहीं है कि प्रदर्शन में कोई अप्रिय घटना होगी। कानून-व्यवस्था संभालना सरकार और पुलिस का काम है। अदालत ने मामले को १० सितंबर के लिए सूचीबद्ध किया है।
यानी पांच सितंबर के मार्च के रास्ते में फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई रोक नहीं है।
आंदोलन ने बदला सत्ता का रुख?
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अखिल स्वामी के साथ चर्चा में पत्रकार दीपक शर्मा ने पूरे घटनाक्रम को सरकार पर बढ़ते राजनीतिक दबाव से जोड़कर देखा है।
प्रो. स्वामी का तर्क है कि युवाओं के आंदोलन को केवल प्रशासनिक कठोरता से नहीं संभाला जा सकता। नई पीढ़ी संवाद चाहती है और यदि उसकी शिकायतों को लंबे समय तक टाला गया तो आंदोलन और बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है।
इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकार का बदला हुआ रुख है। जुलाई के आंदोलन के बाद युवाओं की एक प्रमुख मांग प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की थी। अब वही सरकार सुप्रीम कोर्ट से असाधारण संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करके एफआईआर खत्म कराने की मांग कर रही है।
इसे सरकार की संवेदनशीलता कहा जाए या पांच सितंबर का दबाव—राजनीतिक बहस इसी सवाल पर टिक गई है।
एक बात हालांकि साफ है: फिलहाल यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि ‘सारे मुकदमे वापस हो गए।’ अभी केंद्र ने उन्हें रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू की है और अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर निर्भर करेगा।
सवाल जो सरकार से पूछे जाएंगे
-यदि छात्र निर्दोष थे तो एफआईआर दर्ज क्यों हुर्इं?
-यदि मुकदमे वापस लेने पर सहमति थी तो इसमें एक महीने से अधिक समय क्यों लगा?
-क्या पांच सितंबर का प्रदर्शन घोषित नहीं होता तो सरकार इतनी जल्दी सुप्रीम कोर्ट पहुंचती?
-और सबसे बड़ा सवाल युवा असंतोष को सरकार संवाद से संभालेगी या हर बार आंदोलन बड़ा होने का इंतजार करेगी?

अन्य समाचार