भारतीय लोकतंत्र का पूरी तरह से जनाजा निकल चुका है। पिछले दो दिनों में सरकार ने जिन दो बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है, वह पूरा तमाशा लोकतंत्र का बलात्कार और उसकी हत्या कर लोकतंत्र के शव को सड़क पर फेंकने जैसा ही है। ‘नीट’ परीक्षा के पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के ‘जंतर-मंतर’ पर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने जबरन कब्जे में लिया और अस्पताल में भर्ती करा दिया। वांगचुक के अनशन के बीसवें दिन यह वाकया हुआ। संसद का सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है और शनिवार की आधी रात के बाद अमित शाह की पुलिस हाथों में बंदूकें लिए ‘जंतर-मंतर’ में घुस गई। किसी आतंकवादी को घेरने की तरह एक गांधीवादी कार्यकर्ता की गिरफ्तारी के लिए कॉम्बिंग ऑपरेशन चलाना ही सरकार के डरपोकपन को साबित करता है। सरकार की पुलिस दिन के उजाले में नहीं आई। उतनी उनकी हिम्मत नहीं हुई। वे चोरों की तरह आए और वांगचुक को घसीटते हुए ले गए। २० दिनों के अनशन से थका हुआ वांगचुक का शरीर कोई प्रतिरोध नहीं कर सका। पुलिस की यह करतूत उनकी नामर्दानगी की निशानी है। कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। बीजेपी की एक महिला ने कार्यकर्ताओं पर स्याही फेंकी। इस ‘मर्दानगी’ से बीजेपी सरकार की नपुंसकता सामने आ रही है। वांगचुक को अनशन स्थल से हटाने के कारण सरकार के खिलाफ गुस्सा उबल रहा है। सरकार भ्रष्टाचारियों और व्यभिचारियों को संरक्षण देना चाहती है और इसके खिलाफ आवाज उठानेवालों को जेल में डालना चाहती है। देश के लोकतंत्र को बदनाम और मैला करने की इस कोशिश को अब एकजुट होकर नाकाम करना होगा। झूठ, दमन और बंदूकों के दम पर यह मोदी सरकार टिकी हुई है। ‘नीट’ परीक्षा के घोटाले की तरह ही चुनावों में कई घोटाले करके मोदी और उनके लोग जीते हैं। स्वतंत्रता और लोकतंत्र की चिता जलाकर ये लोग सत्ता में आए हैं, यह बात अब छिपी नहीं रही। यही वजह है कि सोनम वांगचुक का अनशन और उन्हें मिल रहा समर्थन देखकर सरकार डर गई। मोदी राष्ट्रपति ट्रंप से, इजरायल के नेतन्याहू से और सेक्स स्कैंडल वाले एपस्टीन से डरते हैं। वे और उनकी सरकार डरपोक हैं। उनका सीना भी ५६ इंच का नहीं, बल्कि माचिस की एक खाली डिबिया है। अगर ऐसा न होता, तो उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया होता। भ्रष्ट न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र विरोधी पैâसले देने वाले लोकसभा अध्यक्ष को बर्खास्त कर भारतीय लोकतंत्र की छवि चमकाई होती। वांगचुक अस्पताल में हैं और वहां भी उनका संघर्ष जारी है। वे थक चुके हैं, लेकिन एक इंच भी पीछे नहीं हटे हैं। वांगचुक ने अस्पताल के आईसीयू (अति-दक्षता विभाग) से भारतीय जनता के लिए जो संदेश भेजा है, वह बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने हाथों से लिखकर भेजा है कि
‘यह आजादी का दूसरा आंदोलन है।
भयमुक्त भारत,
अन्यायमुक्त भारत!’
वांगचुक का यह आंदोलन और भड़केगा तथा लोकतंत्र विरोधी यह ‘व्यापारी’ सरकार उसी आग में भस्म हो जाएगी।
…और भारतीय संविधान पर!
रात के अंधेरे में सरकार ने सोनम वांगचुक को जबरन उठा लिया। ठीक उसी तरह लोकसभा अध्यक्ष ने भी अंधेरे में ही शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस के ‘गद्दार’ गुट को मान्यता दे दी। भारतीय संसद की महान प्रतिष्ठा पर कलंक लगाने का यह काम मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष द्वारा किया गया। उन्होंने हिंदुत्व के ‘ओम’ को भी दलदल में डुबो दिया। मशाल चुनाव चिह्न पर चुनकर आए छह बेईमान और लंपट सांसदों को फेकनाथ मिंधे ने पचास-पचास करोड़ में खरीद लिया। उन्होंने एक अलग गुट बनाकर मिंधे गुट में विलय की मांग की और बीजेपी के लोकसभा अध्यक्ष ने गद्दारी का यह नजराना कुबूल करते हुए उसे मिंधे गुट को सौंप दिया। यह कृत्य भारतीय संविधान के बिल्कुल खिलाफ है। संसद के परिसर में, गलियारों में और लोकसभा अध्यक्ष के चैंबर में लोकतंत्र का यह सिर्फ चीरहरण ही नहीं है, बल्कि संसद के चौकीदार द्वारा किया गया बलात्कार और हत्या है। भारतीय लोकतंत्र में पैदा हुए रामन राघव ने आजादी के सिर पर रोज वार करके उसे लहुलुहान कर दिया है और नरपिशाचों की तरह सत्ताधीश उस खून के दलदल में नाचकर जश्न मना रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना के सिर पर वार किया, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सिर पर वार किया और आम आदमी पार्टी के सिर पर वार किया। फिर भी वे देशभक्तों की इस लड़ाई को रोक नहीं पाएंगे। भारतीय संविधान की १०वीं अनुसूची के तहत किसी भी प्रकार के पार्टी तोड़ने को मान्यता न होने के बावजूद अमित शाह और उनका गैंग रोज पार्टियां तोड़कर नई टोली बनाती हैं और उन गद्दार टोलियों को लोकसभा अध्यक्ष मान्यता दे देते हैं। मोदी सरकार द्वारा स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संविधान पर किए जा रहे इस बलात्कार और कत्ल के मामले को अब दुनिया के सामने ले जाना होगा। राम मंदिर के चोरों को जैसे माफी नहीं है, वैसे ही गद्दारों को मान्यता देनेवालों को भी कभी माफी नहीं मिलेगी।
