मुख्यपृष्ठनए समाचारचरमरा रही देश की शिक्षा व्यवस्था!

चरमरा रही देश की शिक्षा व्यवस्था!

 – मेडिकल फील्ड में सीटों का टोटा
– नीट के योग्य छात्र लाखों में, पर सीटें सिर्फ हजारों में

द्रुप्ति झा / मुंबई

देश में हर साल डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले लाखों युवा नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट की परीक्षा देते हैं, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी एक कड़वी हकीकत सामने खड़ी है। नीट की परीक्षा पास करने वाले योग्य छात्रों की संख्या जहां लाखों में है, वहीं देश में मेडिकल सीटों की संख्या महज हजारों में सिमटी हुई है। मांग और आपूर्ति का यह भारी अंतर देश की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल रहा है और यह साफ संकेत दे रहा है कि शिक्षा व्यवस्था बुनियादी स्तर पर चरमरा रही है।
बता दें कि हर साल लगभग २० से २४ लाख छात्र नीट की परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से करीब ११ से १३ लाख छात्र काउंसलिंग के लिए क्वालिफाई घोषित किए जाते हैं। इसके विपरीत, पूरे देश के सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों को मिलाकर कुल एमबीबीएस सीटें केवल १ लाख से १.१५ लाख के आसपास ही हैं। इनमें से सरकारी सीटें, जो आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट में आती हैं, उनकी संख्या आधी से भी कम है। नतीजा यह है कि ९० प्रतिशत से अधिक योग्य छात्र परीक्षा पास करने के बाद भी डॉक्टर बनने से वंचित रह जाते हैं।
सरकारी सीट न मिलने पर जो छात्र प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों का रुख करते हैं, उन्हें भारी भरकम फीस का सामना करना पड़ता है। एक आम भारतीय परिवार के लिए ८० लाख से १.५ करोड़ रुपए तक की फीस चुकाना नामुमकिन है। ऐसे में कई प्रतिभाशाली छात्र या तो डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं या फिर उन्हें अपना सपना छोड़कर दूसरे विकल्पों की ओर जाना पड़ रहा है। स्थिति इस कदर खराब हो चुकी है कि छात्र विदेश जाने को मजबूर हो चुके हैं। सीटों की इस भारी कमी के कारण हर साल हजारों भारतीय छात्र यूक्रेन, रूस, चीन, फिलीपींस और कजाकिस्तान जैसे देशों का रुख करते हैं।
महंगी फीस ने बढ़ाई मुश्किलें
सरकारी सीट नहीं मिलने पर निजी मेडिकल कॉलेजों की ८० लाख से १.५ करोड़ रुपये तक की फीस छात्रों और परिवारों पर भारी पड़ती है। मजबूरी में हजारों छात्र विदेशों का रुख करते हैं। विशेषज्ञों ने मेडिकल सीट बढ़ाने और फीस नियंत्रण की मांग की है।

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