मुख्यपृष्ठस्तंभशिलालेख : कर्म ही मनुष्य का अंतिम ठिकाना?

शिलालेख : कर्म ही मनुष्य का अंतिम ठिकाना?

 हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ

भारतीय इतिहास स्मृति का अंदाज निराला है। विश्वामित्र विख्यात गायत्री मंत्र के द्रष्टा हैं और महामृत्युंजय के वशिष्ठ। दोनों के काव्यमंत्र ऋग्वेद में हैं। विश्वामित्र, वशिष्ठ कहां के थे? किस वर्ण के थे? क्या करते थे? आदि प्रश्नों के उत्तर खोजना आसान नहीं। हम भारतीय विश्वामित्र, वशिष्ठ के सूक्तों को गुनगुनाते हैं, दोनों के प्रति श्रद्धालु रहते हैं। भारत की परंपरा में विचार, कथन, काव्य और कर्म की महत्ता है, किसने कहा? कहां कहां? और कब कहा? जैसे तथ्यों को महत्व नहीं दिया गया। याज्ञवल्क्य उत्तरवैदिक काल के दार्शनिक थे। इस कालखंड में संसार को दुखपूर्ण और मुक्ति मोक्ष को श्रेष्ठ बताया जा रहा था। याज्ञवल्क्य ने दोनों की उपासना को सही ठहराया। याज्ञवल्क्य को लेकर भी बहुत मतभेद हैं। अनेक विद्वान उन्हें कुरू पांचाल का निवासी बताते हैं तो कुछेक विद्वान विदेह-क्षेत्र का। उ.प्र. में वाराणसी के निकट आज के चंदौली जिले के लोग उन्हें अपने जनपद का जानते हैं। मिथिला के राजा जनक द्वारा बुलाई गई विद्वत सभा में याज्ञवल्क्य ने जनक सहित अनेक विद्वानों को निरूत्तर किया था। इसमें गार्गी भी थीं।
याज्ञवल्क्य भारतीय दर्शन के पुरोधा हैं और सबसे बड़े आकार वाली उपनिषद् ‘वहृदारण्यकोपनिषद्’ में महानायक। उपनिषद् में जनक के राज्य में याज्ञवल्क्य के दो प्रसंग हैं। पहले प्रसंग के अनुसार, जनक ने यज्ञ किया। अनेक विद्वान आए। प्रथम ब्रह्मज्ञानी के लिए उन्होंने स्वर्ण से मढ़ी सींघों वाली एक हजार गाएं देने की घोषणा की और कहा ‘विद्वतजन आप में जो वरिष्ठ हो, वह गौएं ले जाए।

याज्ञवल्क्य ने अपने सहयोगी से कहा कि तू गौएं ले जा। शेष विद्वान क्रुद्ध हुए। उनसे प्रश्न पूछे जाने लगे। श्रेष्ठतम का निर्णय हुआ नहीं, लेकिन याज्ञवल्क्य अपने सहयोगी को पहले ही गौएं ले जाने का आदेश दे रहे हैं। जनक ने घोषणा की थी कि जो अनुवचन में प्रथम होगा, वही गौएं ले जाएगा, लेकिन याज्ञवल्क्य का आत्मविश्वास गजब का। बहस होगी तो होगी, प्रथम वे ही आएंगे। अन्य प्रतिष्ठित विद्वान थे- अश्वल जारत्कारव, आर्तभाग, भुज्यु, उषस्त चाक्रायण, कहोल, कौषीतकेय, उद्दालक आरुणि और शाकल्य।
प्रश्नों की झड़ी लग गयी। अश्वल ने पूछा ‘यह संसार मृत्यु से व्याप्त है, सब मृत्यु के अधीन हैं। मृत्यु की व्याप्ति का अतिक्रमण वैâसे होता है? यह सब दिन और रात्रि से व्याप्त है, सब दिन और रात्रि के अधीन हैं, दिन और रात्रि की व्याप्ति का अतिक्रमण वैâसे होता है? आगे पूछा ‘अंतरिक्ष आधारहीन है तब कोई बिना आधार के ही वैâसे स्वर्गलोक में चढ़ता है? अश्वल ने और कई प्रश्न पूछे। याज्ञवल्क्य ने उनके उत्तर दिये। आर्तभाग ने पूछा ‘ग्रह कितने हैं? अतिग्रह कितने। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया आठ। फिर पूछा, वे कौन-कौन हैं? उत्तर आया ‘वाक, जिह्वा, आंख, श्रोत्र, मन, हाथ और त्वचा। यही अंतरजगत और वाह्य जगत में आठ-आठ हैं। फिर पूछा, ‘यह संसार मृत्यु का खाद्य है तो मृत्यु किसका खाद्य है?’ उत्तर था, ‘अग्नि मृत्यु है और वह जल का खाद्य है।’ आर्तभाग का एक प्रश्न असाधारण है ‘जिस समय पुरुष मरता है उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता?’ याज्ञवल्क्य का जवाब नितांत संसारी है ‘नाम नहीं छोड़ता नाम अनंत ही है।’ नाम रूप के साथ जुड़ता है, रूप गया, नाम साथ-साथ रहता है। आर्तभाग का अंतिम प्रश्न और उसका उत्तर और भी लौकिक है। पूछा ‘मृत पुरुष की वाणी अग्नि में मिल जाती है, प्राण वायु में, आंखे सूर्य में, मन चंद्रमा में, शरीर पृथ्वी में, हृदयकाश भूताकाश में, रक्तरस जल में और रोम केश औषधियों वनस्पतियों में। उस समय यह पुरुष कहां रहता है? याज्ञवल्क्य ने कहा ‘वह कर्म में विद्यमान रहता है।’ यहां कर्म प्रशंसा है।
गार्गी के प्रश्नोत्तर आधुनिक दर्शन की समस्या है। प्रथम यूनानी दार्शनिक थेल्स (६०० ई.पूर्व) ने सृष्टि उत्पत्ति का आधार जल माना था। ऋग्वेद में भी स्थावर जंगम को जन्म देने वाली जलमाताएं हैं। गार्गी ने पूछा ‘यह सब जल से ओतप्रोत हैं वह जल किसमें ओतप्रोत है? याज्ञवल्क्य ने कहा ‘यह जल वायु में ओत-प्रोत है। पूछा- वायु किसमें? उत्तर मिला वायु अंतरिक्ष लोक में ओतप्रोत है। फिर पूछा ‘अंतरिक्ष लोक किसमें ओतप्रोत है?’ उत्तर था- गंधर्वलोक में। पूछा ‘गंधर्वलोक किसमें?’ उत्तर था, ‘आदित्यलोक में’। फिर पूछा चंद्रलोक किसमें? उत्तर है ‘नक्षत्रलोक में।’ तो नक्षत्र लोक किसमें? उत्तर था, ‘देवलोक में’। इसी तरह आगे पूछा तो उत्तर था देवलोक इंद्रलोक में। फिर इसी तरह के प्रश्न उत्तर में इंद्रलोक को प्रजापतिलोक में और प्रजापति को ब्रह्मलोक में ओतप्रोत बताया। गार्गी ने पूछा, ‘ब्रह्मलोक किसमें?’ याज्ञवल्क्य ने डाटा ‘गार्गी अतिप्रश्न न कर, तेरा मस्तक न गिर जाए।’ शंकराचार्य के भाष्य में अतिप्रश्न की व्याख्या है- ब्रह्म से जुड़ा प्रश्न आनुमानिक होने के कारण विषय का अतिक्रमण है और अतिप्रश्न है।
याज्ञवल्क्य तमाम प्रश्नों से घिरे हुए थे। फिर आरुणि ने तमाम प्रश्न पूछे। इसके बाद गार्गी ने फिर से प्रश्न की अनुमति मांगी। पूछा, ‘द्युलोक के ऊपर और पृथ्वी के नीचे और दोनों के मध्य और ये दोनो लोक तथा भूत, भविष्य और वर्तमान किसमें ओतप्रोत हैं?’ प्रश्न में आधुनिक विज्ञान के टाइम-स्पेस या दिक्काल से जुड़ी जिज्ञासा है। याज्ञवल्क्य ने कहा ‘आकाश में।’ गार्गी ने फिर पूछा ‘आकाश किसमें?’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया ‘उस तत्व को ब्रह्म विज्ञानी ‘अक्षर’ कहते हैं। वह न स्थूल है, न महीन। न छोटा, न बड़ा। न द्रव न ठोस। न छाया, न अंधकार। न वायु, न आकाश। न रस, न गंध, न नेत्र न कान, न वाणी और न मन। न तेज, न प्राण, न अंतर, न बाहर आदि। इस अक्षर के प्रशासन में सूर्य चंद्र, द्युलोक, पृथ्वीलोक स्थित हैं- एतस्य व अक्षरस्य प्रशासने।’ प्रशासन आज सरकारी शब्द है। याज्ञवल्क्य ने इसका प्रयोग उत्तरवैदिक काल में ही किया था। गार्गी संतुष्ट हो गर्इं। रोमांचक आश्चर्य है कि भारत में प्रकृति विज्ञान के विषयों पर अतिप्राचीन काल में खुली बहसें होती थीं।
भारत में बहुदेव उपासना है। देवताओं की संख्या पर तमाम तीर-तुक्के चलते हैं। जान पड़ता है कि याज्ञवल्क्य के समय भी ऐसे ही संशय थे। इसी गोष्ठी में शाकल्य ने पूछा ‘कति देवा याज्ञवल्क्य?- देवता कितने हैं याज्ञवल्क्य?’ उत्तर था, ‘मंत्रपदों के अनुसार, तीन हजार तीन सौ छह’। शाकल्य ने फिर पूछा ‘कितने देव हैं?’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- तैंतीस। उसने वही प्रश्न फिर दोहराया। याज्ञवल्क्य ने कहा- छह। फिर दोहराया तो कहा तीन। फिर पूछा तो कहा दो। फिर वही पूछा तो कहा डेढ़। फिर वही पूछा तो कहा एक। शाकल्य ने पूछा तो वे तीन हजार तीन सौ छत्तीस कौन हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘ये महिमाएं हैं देव तो ३३ ही है। वे है ८ वसु, ११ रुद्र और १२ आदित्य।’ फिर बताया, ‘अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र वसु हैं, इन्हीं में जगत बसता है सो ये वसु हैं।’ वसु देव प्रकृति की ही शक्तियां हैं। फिर रुद्र के बारे में बताया ‘१० इंद्रियां, ११वां मनआत्मा। ये उत्क्रमण काल में रूलाते हैं इसलिए रुद्र हैं।’ यहां शरीर विज्ञान के अंग रुद्र देव हैं। फिर बताया ‘जगत् की ऊर्जा इंद्र हैं।’ यहां देवता प्रकृति की शक्तियां ही हैं। इस महागोष्ठी में अनेक दार्शनिक प्रश्नोत्तर हुए थे। कुछेक का उल्लेख ही इस आलेख में है। समूचे प्रश्नोत्तर का मजा लेने के लिए सीधे वृहदारण्यक उपनिषद् पढ़ने में कोई हर्जा-खर्चा नहीं।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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