मुख्यपृष्ठस्तंभक्या उपभोक्तावाद के जाल में फंस रहा है आम भारतीय?

क्या उपभोक्तावाद के जाल में फंस रहा है आम भारतीय?

-तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्टोर में दाखिल हुआ पहला ग्राहक
-देर रात से लाइन में खड़े रहे लोग

अंधेरी रात का सन्नाटा अभी टूटा भी नहीं था कि दिल्ली के एक मशहूर मॉल के बाहर लोगों की कतारें लंबी होने लगी थीं। मौका था-आईफोन एटीन प्रो और एटीन प्रो मैक्स की भारतीय बाजार में पहली बिक्री का। स्टोर्स खुलने में अभी कई घंटे बाकी थे, लेकिन तकनीकी के दीवानों का उत्साह उनकी नींद पर भारी पड़ रहा था। लाइट्स ऑन होते ही कांच के दरवाजे खुले और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ पहला ग्राहक स्टोर के भीतर दाखिल हुआ। चारों तरफ डिस्प्ले पर चमकते डीप ब्लैक, ग्लेशियर, सिल्वर और बरगंडी रंग के नए आईफोंस हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे। कोई २५६जीबी तो कोई सीधे २टीबी वाले वेरिएंट पर हाथ आजमा रहा था। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स-फ्लिपकार्ट, अमेजन, विजय सेल्स, क्रोमा और जेप्टो-पर भी ऑर्डर्स की बाढ़ आई हुई थी। लोग क्रेडिट कार्ड डिस्काउंट, एक्सचेंज बोनस और नो-कॉस्ट ईएमआई के गणित लगाकर इन प्रीमियम फोंस को अपने नाम करने की होड़ में लगे थे। यह दृश्य केवल एक नए फोन की लॉन्चिंग भर नहीं था, बल्कि यह भारत के बदलते आर्थिक मिजाज और उपभोक्ता व्यवहार का एक अनूठा उदाहरण था। भीड़ धीरे-धीरे और बढ़ रही थी। नए फोंस के डिब्बे खुल रहे थे, वैâमरे की नई लेंस तकनीकों का परीक्षण हो रहा था और बिलिंग काउंटरों पर मशीनें लगातार रसीदें छाप रही थीं।
हर साल एप्पल के नए स्मार्टफोन का लॉन्च होना अब सिर्फ एक टेक इवेंट नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य बन चुका है। आईफोन एटीन प्रो और प्रो मैक्स की बिक्री शुरू होते ही देश के प्रमुख शहरों में स्टोर्स के बाहर देर रात से ही लोगों की लंबी कतारें देखने को मिलीं। १,६४,९०० रुपए से लेकर ३,२९,९०० रुपए तक की भारी-भरकम कीमत के बावजूद, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और रिटेल स्टोर्स पर इन फोंस को खरीदने की होड़ मची हुई है। लेकिन इस दीवानगी के बीच एक बड़ा विचारणीय प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या हर साल लाखों रुपए का नया फोन खरीदना वित्तीय समझदारी है या फिर यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सुनियोजित विपणन (मार्केटिंग ) का शिकार होना है?
वित्तीय गिरावट बनाम सुरक्षित संपत्ति
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्मार्टफोन एक मूल्य-ह्रास वाली संपत्ति (Depreciating Asset) है। जिस क्षण आप एक लाख से अधिक का फोन डिब्बे से बाहर निकालते हैं, उसकी कीमत में २० से ३० प्रतिशत की गिरावट आ जाती है। तीन-चार सालों में इसकी रीसेल वैल्यू बेहद कम रह जाती है। इससे भरोसेमंद निवेश तो सोना (Gold) है। सोना समय के साथ अपनी वैल्यू बढ़ाता है और मुद्रास्फीति (Inflation) के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करता है। जब सरकार बेवजह सोने की खरीद से दूर रहने को कह सकती है तो वो बेवजह आई फोन की खरीद से बचने को क्यों नहीं कहती। क्योंकि हर साल नया फोन खरीदना पैसे को कचरे में डालने जैसा है, जबकि उसी पैसे से सोना या अन्य संपत्तियां खरीदना वित्तीय भविष्य को सुरक्षित बनाता है। आंकड़े बता रहे थे कि एप्पल का भारत में सालाना राजस्व लगभग ७९,३७८ करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। यह कंपनी भारत से रोजाना औसतन २१७ करोड़ रुपए का व्यापार कर रही थी। भारतीय स्मार्टफोन बाजार में भले ही एप्पल की हिस्सेदारी संख्या के मामले में ९ प्रतिशत थी, लेकिन कुल बाजार मूल्य में उसकी हिस्सेदारी २८ प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर को छू चुकी थी।
उपभोक्ता मानसिकता में
बदलाव की जरूरत
तकनीक का उद्देश्य हमारी जिंदगी को आसान और सुगम बनाना है, न कि हमें दिखावे के अंधी दौड़ में धकेलना। जब तक उपभोक्ता यह नहीं समझेंगे कि हर साल थोड़ा सा अपडेट करके नया उत्पाद बेचना कंपनियों का व्यापारिक मॉडल है, तब तक वे अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों की झोली में डालते रहेंगे। समय आ गया है कि `स्टेटस सिंबल’ की इस अंधी दौड़ से बाहर निकलकर उपभोक्ता समझदारी भरे वित्तीय फैसले लें और तकनीक को केवल एक आवश्यकता के रूप में अपनाएं, न कि सनक के रूप में।

`प्लान्ड ऑब्सोलिसेंस’ और स्टेटस सिंबल का खेल
आर्थिक विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक टेक कंपनियां-विशेष रूप से एप्पल-एक बहुत ही सटीक योजना के तहत काम करती हैं। हर साल नए मॉडल में केवल मामूली अपडेट्स दिए जाते हैं। कभी कैमरे का मेगापिक्सल थोड़ा बढ़ा दिया जाता है, कभी प्रोसेसर की गति में १०-१५ प्रतिशत का सुधार किया जाता है, तो कभी एक नया रंग बाजार में उतार दिया जाता है। यह कोई बहुत बड़ा तकनीकी बदलाव नहीं होता, लेकिन विज्ञापन और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं के मन में `फोमो’ (पीछे छूट जाने का डर) पैदा किया जाता है। फोन को सिर्फ एक उपकरण न बनाकर उसे `सोशल स्टेटस’ से जोड़ दिया जाता है। मौजूदा स्थिति यह है कि जो फोन ४ से ५ साल तक आसानी से बेहतरीन प्रदर्शन कर सकता है, उसे लोग महज एक साल में बदलकर खुद पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डाल रहे हैं।

 

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