एनडीटीवी पर प्रकाशित ‘सुधार के साथ निरंतरता’ शीर्षक वाला लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति को ‘मध्यम मार्ग’ के रूप में पेश करता है। लेख का संदेश साफ है। मोदी ने व्यवस्था को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे सुधारते हुए आगे बढ़ाया। मनरेगा को जारी रखा, आधार का विस्तार किया और संविधान में बड़े बदलाव से परहेज किया। सुनने में यह सब बुद्ध के मध्यम मार्ग जैसा संतुलित लगता है, लेकिन सवाल यह है कि इस कथित मध्यम मार्ग का फायदा आम आदमी को कितना मिला?
लेखक कौन हैं? सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार। नीचे लिखा है ‘व्यक्तिगत विचार’। यानी सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सरकार की नीतियों पर ही प्रशंसात्मक लेख लिखा और उसे व्यक्तिगत विचार बता दिया। सवाल यह नहीं कि अधिकारी को अपनी राय रखने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि सरकार की नीतियों का विश्लेषण करने वाले लेख में जनता के अनुभव और असुविधाओं की आवाज कहां है? अगर सिर्फ उपलब्धियां गिनानी हों तो विश्लेषण और प्रचार के बीच की रेखा बहुत पतली हो जाती है।
डिजिटल मनरेगा, इंतजार करता मजदूर
मनरेगा को डिजिटल बनाया गया, यह तथ्य है। आधार और डिजिटल व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ा, यह भी तथ्य है, लेकिन डिजिटल व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने आंकड़े ऑनलाइन हो गए। असली सवाल यह है कि मजदूर को उसकी मजदूरी समय पर मिली या नहीं। जिस मजदूर के खाते में मजदूरी पहुंचने में हफ्तों का इंतजार हो, उसके लिए डिजिटल व्यवस्था कितनी चमकदार है? तकनीक व्यवस्था को आसान बनाने के लिए है या गरीब को व्यवस्था के चक्कर लगाने के लिए? आधार से फर्जीवाड़ा रोकने का दावा किया गया। लेकिन जिन मामलों में पहचान सत्यापन की तकनीकी दिक्कत के कारण गरीब को राशन नहीं मिल पाता, उसका दर्द आंकड़ों में दिखाई नहीं देता। मशीन की पहचान में अंगूठा न मिले तो भूख इंतजार नहीं करती।
महिला को आरक्षण नहीं, तारीख मिली
महिला आरक्षण कानून को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया। निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम है। लेकिन इसके लागू होने की प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन से जुड़ी है। ऐसे में सवाल उठता है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बराबरी का इंतजार आखिर कितना लंबा होगा?
आज की महिला से कहा जा रहा है। कानून बन चुका है, अधिकार मिलेगा, लेकिन बाद में। यानी अधिकार का वादा आज और उसका इस्तेमाल भविष्य में। लोकतंत्र में तारीख से ज्यादा जरूरी प्रतिनिधित्व है।
आरक्षण आया, नौकरियां कहां हैं?
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। लेकिन आरक्षण का वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा जब पर्याप्त सरकारी नौकरियां उपलब्ध हों। सरकारी भर्तियों का आकार सीमित होता जाए और नौकरियों के अवसर घटते जाएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का लाभ आखिर कितने लोगों तक पहुंचेगा? सिर्फ आरक्षण की घोषणा से रोजगार का संकट खत्म नहीं होता। नौकरी चाहिए, नियुक्ति चाहिए और नियमित आय चाहिए।
नाम नया, समस्या वही?
कहा जा रहा है कि मोदी ने कोई क्रांति नहीं की, बल्कि व्यवस्था में सुधार किया। लेकिन सवाल यह है कि जिस व्यवस्था में अफसरशाही की देरी, महंगाई, बेरोजगारी और आम आदमी की परेशानियां बनी रहें, उसे सिर्फ ‘निरंतर सुधार’ कह देने से क्या बदल जाता है? कागज पर योजनाएं बदल सकती हैं, आंकड़ों की प्रस्तुति बदल सकती है, योजनाओं के नाम बदल सकते हैं। लेकिन जनता का अनुभव नहीं बदलता तो सवाल वहीं खड़ा रहता है।
