मुख्यपृष्ठनए समाचार‘सब ओर मेरी सत्ता है, यह मानना ही अधर्म है’

‘सब ओर मेरी सत्ता है, यह मानना ही अधर्म है’

सामना संवाददाता / उज्जैन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में कहा कि धर्म हमारे डीएनए और आचरण में है, जबकि रिलीजन हमें बांधता है। जो यह मानकर चलता है कि सब ओर मेरी सत्ता चलती है, वही अधर्म करता है। उज्जैन में तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के उद्घाटन सत्र में १,७०० जेन-जी युवाओं को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि जीवन में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, पर हम नित्य हैं और हमारा धर्म नित्य है। धर्म की कल्पना इतनी गहरी है कि जन्म-जन्मांतर तक उसका अन्वेषण करो, फिर भी पूरा समझ न आए। उन्होंने रिलीजन और धर्म का अंतर स्पष्ट किया – पाश्चात्यों ने धर्म को रिलीजन बना दिया। रिलीजन शब्द का अर्थ बांधना, एक अनुशासन में रखना है, जबकि धर्म मुक्त करता है। धर्म ‘ध्रुव’ और ‘धारणा’ से बना है – जो टिकाए रखे, जोड़े रखे, बिखरने न दे, वही धर्म है।

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