अमिताभ श्रीवास्तव
कल की सुबह भारतीय बैडमिंटन और पीवी सिंधु के लिए सुनहरी सुबह रही। एक तरफ जहां सिंधु ने १९ महीने का सूखा फाइनल जीत कर खत्म किया, वहीं दूसरी ओर वह पहली शटलर बनी, जिसने यह टूर्नामेंट अपने नाम किया है। जी हां, ओलंपिक मेडलिस्ट पीवी सिंधु ने जापान ओपन २०२६ को जीतकर इतिहास रच दिया। फाइनल में सिधुं की टक्कर अकाने यामागुची से हुई। खिताबी मुकाबले में सिंधु ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए अकाने यामागुची को सीधे गेम में २१-१७, २१-१७ से हरा दिया। यह जीत सिंधु के लिए बेहद भावुक और बड़ी है, क्योंकि इससे उनका १९ महीने लंबा खिताबी जीत का सूखा खत्म हो गया है। सिंधु की आखिरी जीत २०२४ के सैयद मोदी इंटरनेशनल बैडमिंटन टूर्नामेंट में आई थी। चोटों और खराब फॉर्म से जूझने के बाद ३१ वर्षीय सिंधु की इस जीत ने बैडमिंटन जगत को यह कड़ा संदेश दिया है कि वे अभी भी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में लौट आई हैं और बड़े स्तर पर प्रतिस्पर्धा का दमखम रखती हैं। इस खिताबी जीत से सिंधु ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं। वह जापान ओपन का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी (पुरुष या महिला) बनी हैं। यह सिंधु के करियर का पहला सुपर ७५० स्तर का खिताब है। साल २०१९ में विश्व चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीतने के बाद यह सिंधु के करियर की अब तक की सबसे बड़ी खिताबी जीत है। वह विश्व नंबर-३ यामागुची को सीधे गेमों में हराने वाली चुनिंदा खिलाड़ियों में शुमार हुई हैं।
जबरन के मैच में रिकॉर्ड!
विश्वकप फुटबॉल में तीसरे नंबर की टीम बनने के लिए कौन ज्यादा मेहनत करता है, जो इंग्लैंड या फ्रांस करता। वैसे ये जले पर नमक छिड़कने जैसा ही होता है, इससे फायदा कुछ नहीं। पर रैंक और धन के लिए टीमे खेलती हैं, मगर अपनी असल शक्ति के साथ नहीं। अब देखिये न, कांस्य पदक के लिए खेलने की कोई इच्छा भी होती है, जो प्रâांस और इंग्लैंड को होती। लिहाजा दोनों ने अपनी बी टीम उतारी। इंग्लैंड के कप्तान हैरी केन और तेजतर्रार खिलाड़ी बेलिंगहेम खेलने ही नहीं उतरे। फ्रांस के कप्तान एम्बापे गोल्डन बूट के लालच में खेलने उतरे, लेकिन उनके पीछे की फौज उतरी ही नहीं। हालांकि इंग्लैंड की बी टीम उनकी ए टीम से बेहतर खेल गई और गोलों की बारिश कर दी। फ्रांस को ६-४ से हरा दिया। मतलब कुल दस गोल। बेलिंगहैम बाद में मैदान पर आए और मजा देखो आते उसने आर्सिनल के खिलाड़ी साका को पेनल्टी लेने को कहा और विश्व कप में खाली जा रहे बंदे ने गोल की हैट्रिक मार दी! पूरा मैच ऐसा लगा जैसे बस औपचारिकता के लिए खेला जा रहा है। यदि गोल्डन बूट का लालच नहीं रहता तो एम्बापे खेलने नहीं उतरता। इंग्लैंड ने भी सोचा कि दो गोल मारने देते हैं, ताकि मेसी को पीछे धकेला जा सके। ९० मिनिट में जहां दोनों टीमे इसके पहले एकाध गोल करने के लिए खून पसीना एक करती रही, वहां धड़ाधड़ गोल होते रहे। शायद अपने प्रशंसकों के लिए यह मैच था, जो खुश हो गए। जबरन वाले मैच में दस गोल का रिकॉर्ड भी बना।
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार व टिप्पणीकार हैं।)
