मुख्यपृष्ठनए समाचारबिहार कैबिनेट विस्तार पर सियासी संग्राम: ‘बिहार में खुला परिवारवाद का दफ्तर’-कांग्रेस

बिहार कैबिनेट विस्तार पर सियासी संग्राम: ‘बिहार में खुला परिवारवाद का दफ्तर’-कांग्रेस

अनिल मिश्र/पटना

बिहार में हालिया मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों पर निशाना साधते हुए इसे “परिवारवाद को बढ़ावा देने वाला कदम” करार दिया है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि यह विस्तार योग्यता नहीं, बल्कि रिश्तों और वंशवाद के आधार पर किया गया है।

बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रतिनिधि और प्रवक्ता विजय कुमार मिट्ठू समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने संयुक्त बयान में कहा कि जिन दलों ने हमेशा परिवारवाद के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाई, वही अब खुले तौर पर उसी राह पर चल रहे हैं। उनके अनुसार, जदयू, रालोसपा, हम और भाजपा में परिवार के सदस्यों को सत्ता में लाने की होड़ मची हुई है।

कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि बिना किसी विधायी अनुभव या सदन की सदस्यता के ही कई नेताओं के परिजनों को सीधे कैबिनेट में शामिल किया गया। उन्होंने कहा कि जदयू, रालोसपा और हम जैसे दलों में शीर्ष नेतृत्व अपने बेटों और करीबी रिश्तेदारों को मंत्री बनवाने में जुटा है। भाजपा पर भी परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा गया कि गठबंधन में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।

पूर्व विधायक मोहम्मद खान अली, जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष बाबूलाल प्रसाद सिंह, दामोदर गोस्वामी, विपिन बिहारी सिन्हा, विशाल कुमार, मुन्ना मांझी, सुभाष चंद्र सिंह, प्रद्युम्न दुबे और अशोक राम समेत अन्य नेताओं ने कहा कि यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। उनका कहना है कि सत्ता में बैठे दल “परिवारवाद की रेवड़ियां” बांट रहे हैं, जिससे योग्य और जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है।

कांग्रेस का यह भी दावा है कि बिहार की जनता इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से देख रही है और समय आने पर इसका जवाब देगी। नेताओं ने कहा कि यह सिर्फ मंत्रिमंडल विस्तार नहीं, बल्कि “परिवारवाद का दफ्तर खोलने” जैसा कदम है, जो लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में सियासी घमासान और तेज हो सकता है। जहां विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है, वहीं सत्ताधारी दलों की ओर से अभी तक इस पर कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

बिहार की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा संवेदनशील रहा है। ऐसे में कैबिनेट विस्तार के बाद उठे ये आरोप आगामी राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकते हैं। अब नजर इस बात पर है कि सत्ताधारी दल इन आरोपों का किस तरह जवाब देते हैं और जनता इस बहस को किस नजरिए से देखती है।

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