–हंसाते हुए समाज की आत्मा को झकझोरने वाला साहित्य
प्रो. दयानंद तिवारी
हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई का नाम ऐसे व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित है, जिन्होंने व्यंग्य को केवल हंसी और मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक चेतना, नैतिक प्रतिरोध और वैचारिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी रचनाएं पाठक को पहले मुस्कुराने के लिए विवश करती हैं और फिर उसी मुस्कान के भीतर छिपी विडंबना पर गंभीरता से सोचने को बाध्य करती हैं। यही विशेषता उन्हें हिंदी व्यंग्य साहित्य का अप्रतिम हस्ताक्षर बनाती है।
परसाई का साहित्य किसी एक कालखंड का दस्तावेज नहीं है। उसमें जिन सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और नैतिक विसंगतियों को उजागर किया गया है, वे आज भी हमारे आसपास उपस्थित हैं। उनके स्वरूप अवश्य बदल गए हैं, किंतु मूल चरित्र लगभग वैसा ही है। इसीलिए परसाई को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि वे आज के भारत, आज की राजनीति और आज के सामाजिक व्यवहार पर ही टिप्पणी कर रहे हैं।
हंसी के भीतर छिपा गहरा आक्रोश
परसाई की रचनाओं में हास्य दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा आक्रोश और सामान्य मनुष्य के प्रति गहरी संवेदना छिपी होती है। वे समाज की विसंगतियों पर दूर खड़े होकर टिप्पणी नहीं करते, बल्कि उनके बीच उतरकर वास्तविकता सामने लाते हैं। उनकी व्यंग्य-दृष्टि उस चिकित्सक के समान है, जो रोग छिपाने के बजाय उपचार के लिए उसकी सही पहचान करता है।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएं सदाचार का ताबीज, भोलाराम का जीव, विकलांग श्रद्धा का दौर, इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर, प्रेमचंद के फटे जूते और ठिठुरता हुआ गणतंत्र आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती हैं। इन रचनाओं में भ्रष्टाचार, नौकरशाही, राजनीतिक पाखंड, अवसरवाद और खोखली नैतिकता पर तीखा प्रहार मिलता है। परसाई का एक प्रसिद्ध कथन है, ‘बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है।’ यह पंक्ति मनुष्य की उस मानसिकता को उजागर करती है, जिसमें वह अपनी कमियों को स्वीकार करने के बजाय दूसरों को भी दोषी सिद्ध करके आत्मसंतोष प्राप्त करता है।
मानवीय मूल्यों के सजग पक्षधर
परसाई केवल आलोचक नहीं थे। उनका साहित्य मनुष्य की गरिमा, ईमानदारी, समानता, न्याय और विवेक के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। वे जानते थे कि समाज को सबसे बड़ा खतरा केवल भ्रष्ट शासकों या अधिकारियों से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से है जो भ्रष्टाचार और अनैतिकता को धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार मान लेती है।
वे लिखते हैं, ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं।’ यह पंक्ति उस बौद्धिक वर्ग पर कठोर टिप्पणी है, जिसके पास ज्ञान और विवेक तो है, लेकिन सुविधाओं, भय अथवा स्वार्थ के कारण वह सत्य के पक्ष में खड़ा होने का साहस नहीं दिखाता। आज जब अनेक बुद्धिजीवी विचार से अधिक अपने हित और खेमे के प्रति निष्ठावान दिखाई देते हैं, तब यह कथन और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।
सामाजिक कुरीतियों पर चुटीला प्रहार
परसाई ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों, जातिगत अहंकार, दिखावे और अवसरवादी संबंधों को बेनकाब किया। उनकी लेखनी किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति के विरुद्ध चलती थी, जो समाज को भीतर से खोखला करती है। वे साधारण घटनाओं में छिपी असाधारण विसंगतियों को पकड़ लेते थे।
उन्होंने बड़ी सहजता से लिखा, ‘जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छाने पी जाते हैं।’ यह छोटी-सी पंक्ति सभ्यता और सदाचार का दिखावा करने वाले लोगों का पूरा चरित्र खोल देती है। बाहरी शुद्धता का आग्रह रखने वाला व्यक्ति यदि व्यवहार में निर्दयी, स्वार्थी और शोषक हो, तो उसका आडंबर अर्थहीन हो जाता है।
आज उपभोक्तावाद ने संबंधों को प्रभावित किया है। सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदर्शन का विषय बन गई है और मनुष्य वास्तविक जीवन से अधिक अपनी आभासी छवि संवारने में लगा है। लोग विचारों से अधिक प्रचार और सत्य से अधिक भ्रम पर विश्वास करने लगे हैं। ऐसे वातावरण में परसाई का व्यंग्य हमारे व्यवहार का आईना बन जाता है।
धार्मिक आडंबर के विरुद्ध, आस्था के नहीं
परसाई ने धर्म का नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर किए जाने वाले पाखंड, शोषण और व्यापार का विरोध किया। वे सच्ची आस्था तथा मानवीय करुणा का सम्मान करते थे, किंतु उन लोगों पर कठोर प्रहार करते थे, जो धार्मिक वेशभूषा, कर्मकांड और चमत्कारों के सहारे जनता के भय तथा विश्वास का लाभ उठाते हैं।
परसाई ने कहा था, ‘श्रद्धा का दौर है और किसी समय विवेक से काम लेना पाप माना जाता है।’ यह कथन उस अंधभक्ति पर चोट करता है, जिसमें प्रश्न पूछने और तर्क करने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। उनके लिए वही धर्म सार्थक था, जो मनुष्य को अधिक संवेदनशील, न्यायप्रिय और विवेकशील बनाए।
लोकतंत्र और राजनीति की सजग पड़ताल
परसाई लोकतंत्र के समर्थक थे, इसलिए लोकतांत्रिक संस्थाओं में पैâलती विकृतियों पर मौन नहीं रहे। उन्होंने सत्ता के अहंकार, नेताओं की कथनी और करनी के अंतर, चुनावी वादों तथा राजनीतिक अवसरवाद को निर्भीकता से उजागर किया। उनकी रचनाओं में जनता की विवशता भी है और उसकी राजनीतिक निष्क्रियता पर प्रश्न भी।
आज राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप, दल-बदल और प्रचार की चमक जिस प्रकार वास्तविक समस्याओं को पीछे छोड़ देती है, उसे देखकर परसाई का साहित्य और अधिक समकालीन लगता है। उनकी लेखनी चेतावनी देती है कि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकता, नैतिक साहस और सत्ता से प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति से जीवित रहता है।
आज परसाई की आवश्यकता क्यों है?
परसाई का साहित्य हमें केवल दूसरों पर हंसना नहीं, बल्कि स्वयं पर भी हंसना सिखाता है। वह हमारे भीतर बैठे पाखंडी, अवसरवादी और सुविधाभोगी मनुष्य की पहचान कराता है। उनका व्यंग्य विनाश के लिए नहीं, सुधार के लिए है; अपमान के लिए नहीं, आत्मबोध के लिए है।
आज जब असहमति को विरोध, आलोचना को शत्रुता और प्रश्न को अपराध समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तब परसाई की निर्भीक लेखनी साहित्यकार का वास्तविक दायित्व याद दिलाती है। उन्होंने सिद्ध किया कि व्यंग्य समाज का विदूषक नहीं, बल्कि उसका सजग प्रहरी है। परसाई इसलिए कालजयी हैं, क्योंकि उनके उठाए प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़े हैं। उनका साहित्य हमें हंसाता अवश्य है, लेकिन हंसी समाप्त होते ही हमारे विवेक का दरवाजा खटखटाने लगता है।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
