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शरद पूर्णिमा-आकाश से अमृत वर्षा

शीतल अवस्थी

आश्विन मास की पूर्णिमा को चंद्रमा की सोलह कलाओं, देवी लक्ष्मी के जागरण और भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जोड़ा जाता है। चांदनी में खीर रखने की परंपरा इस पर्व को विशिष्ट बनाती है, लेकिन ‘अमृत वर्षा’ को धार्मिक और प्रतीकात्मक मान्यता के रूप में समझना चाहिए।

शरद ऋतु की सबसे उजली रात मानी जाने वाली आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे कोजागरी पूर्णिमा, कौमुदी उत्सव और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। वर्षा ऋतु के बाद स्वच्छ आकाश और चमकती चांदनी के कारण इस पूर्णिमा का प्राकृतिक सौंदर्य विशेष आकर्षक होता है।

धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृततुल्य शीतलता बरसती है। इसी कारण लोग चंद्रमा की रोशनी में खीर रखते हैं और अगली सुबह उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

चंद्रमा की सोलह कलाएं

भारतीय दर्शन और पौराणिक परंपरा में चंद्रमा को मन, शीतलता, सौंदर्य, औषधि और रस का कारक माना गया है। शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा के पूर्ण कलाओं से युक्त होने की मान्यता है। सोलह कलाएं पूर्णता, चेतना और जीवन की समस्त क्षमताओं का प्रतीक मानी जाती हैं।

धर्मग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं से पूर्ण अवतार कहा गया है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात्रि का संबंध उनकी महारास लीला से भी जोड़ा जाता है।

श्रीकृष्ण की महारास लीला

भागवत परंपरा के अनुसार शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास किया था। आध्यात्मिक दृष्टि से महारास को सामान्य नृत्य नहीं, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना गया है।

गोपियों की भक्ति पूर्ण समर्पण का रूप थी। श्रीकृष्ण ने प्रत्येक गोपी के साथ उपस्थित होकर यह संदेश दिया कि ईश्वर अपने प्रत्येक भक्त की भावना को व्यक्तिगत रूप से स्वीकार करते हैं। रासलीला अहंकार छोड़कर प्रेम और भक्ति में लीन होने की प्रेरणा देती है।

कोजागरी-कौन जाग रहा है?

शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ‘को जागर्ति?’ का अर्थ है—कौन जाग रहा है? लोकमान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा करती हैं।

इसलिए कई परिवार रात्रि-जागरण करके लक्ष्मी पूजन, भजन, विष्णु सहस्रनाम और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं। यहां जागरण का अर्थ केवल रातभर न सोना नहीं, बल्कि आलस्य, अज्ञान और असावधानी से जागकर कर्तव्य के प्रति सजग होना भी है।

देवी लक्ष्मी का मंत्र है—

*ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।*

 चांदनी में खीर रखने की परंपरा

शरद पूर्णिमा की रात दूध और चावल की खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा है। खीर में इलायची, केसर और सूखे मेवे मिलाए जाते हैं। इसे ऐसे स्वच्छ स्थान पर रखा जाता है, जहां चंद्रमा की रोशनी पड़े। बर्तन को खुला छोड़ने के बजाय साफ महीन जाली या सुरक्षित ढक्कन से ढकना चाहिए, ताकि धूल, कीड़े और अन्य दूषित पदार्थ उसमें न गिरें।

धार्मिक विश्वास है कि खीर में चंद्र किरणों की अमृततुल्य शीतलता समाहित हो जाती है। अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

वैज्ञानिक रूप से आकाश से वास्तविक अमृत बरसने का प्रमाण नहीं है। खुली रात में रखे भोजन पर तापमान और ओस का प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन इससे कोई सिद्ध औषधीय चमत्कार नहीं होता। इस परंपरा का महत्त्व धार्मिक आस्था, ऋतु-परिवर्तन और सामूहिक उत्सव में है।

खीर रखते समय स्वास्थ्य-सावधानी

दूध से बनी खीर जल्दी खराब हो सकती है। गर्म या आर्द्र मौसम में उसे पूरी रात बाहर रखना सुरक्षित नहीं होता। खीर को पहले अच्छी तरह ठंडा करें, स्वच्छ ढके बर्तन में सीमित समय के लिए चांदनी में रखें और फिर फ्रिज में सुरक्षित कर दें।

खीर में दुर्गंध, खट्टापन या असामान्य स्वाद हो तो उसे प्रसाद मानकर भी ग्रहण न करें। मधुमेह, दूध से एलर्जी या लैक्टोज असहिष्णुता वाले लोगों को अपनी स्वास्थ्य-स्थिति के अनुसार ही सेवन करना चाहिए।

शरद पूर्णिमा की पूजा-विधि

प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करें। घर और पूजा-स्थान की सफाई करके दीपक जलाएं। भगवान को पीले पुष्प और देवी लक्ष्मी को कमल या उपलब्ध सुगंधित पुष्प अर्पित करें।

रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल, दूध और सफेद पुष्प के साथ अर्घ्य दिया जा सकता है। अर्घ्य देते समय जल की बर्बादी न करें। इसके बाद खीर का भोग लगाकर भजन, मंत्र-जप अथवा श्रीमद्भागवत की रासलीला का पाठ करें।

व्रत रखने वाले लोग अपने स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और औषधि लेने वाले लोगों को कठोर उपवास से बचना चाहिए।

पर्व का आध्यात्मिक संदेश

शरद पूर्णिमा की निर्मल चांदनी मन के अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। चंद्रमा स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करता, बल्कि सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी प्राप्त ज्ञान और सामर्थ्य को समाज के हित में फैलाना चाहिए।

इस पर्व की ‘अमृत वर्षा’ का गहरा अर्थ प्रेम, शांति, ज्ञान और करुणा की वर्षा है। यदि शरद पूर्णिमा पर हम मन की कटुता छोड़कर संबंधों में मिठास, व्यवहार में शीतलता और जीवन में जागरूकता लाने का संकल्प लें, तो चंद्रमा की यह उजली रात सचमुच अमृतमयी बन सकती है।

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