मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : पुणे में ‘राहुल-राहुल’ की गूंज और बदलते भारत की आहट

तीर-ए-तौसीफ : पुणे में ‘राहुल-राहुल’ की गूंज और बदलते भारत की आहट

 तौसीफ कुरैशी

कोटा, देहरादून व प्रयागराज के बाद पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान महिलाओं के बीच जब ‘राहुल-राहुल’ की आवाज गूंजी तो उसे केवल एक राजनीतिक नारे की तरह सुनना भूल होगी। राजनीति में नारे कभी-कभी हवा में नहीं बनते। वे उस समय की बेचैनी, उम्मीद और बदलाव की आकांक्षा का स्वर होते हैं। सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति एक बार फिर किसी नए राजनीतिक आकर्षण के दौर में प्रवेश कर रही है?
२०१४ का दौर और विकास के मॉडल का सच
याद कीजिए, २०१३-१४ का दौर। देश में एक ऐसा राजनीतिक वातावरण बनाया गया था, जिसमें एक व्यक्ति को विकास के नए प्रतीक के रूप में पेश किया गया जो सच्चाई से कोसों दूर था, यह साबित हुआ है नफरत के अलावा कुछ नहीं था और यही हुआ है। ‘गुजरात मॉडल’ नाम का एक ऐसा शिगूफा उछाला गया, जिसने प्रचार की ताकत से अपनी अलग राजनीतिक दुनिया बना ली, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पाखंड था। नफरत, ध्रुवीकरण और आक्रामक तरीके से फर्जी राष्ट्रवाद की राजनीति के साथ एक चमकदार विकास मॉडल का पोस्टर चिपका दिया गया। जनसभाओं में भीड़ ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाती थी और उस शोर को देश की नई राजनीतिक चेतना बता दिया गया। लेकिन बारह वर्षों बाद देश के सामने सवाल खड़े हैं।
बेरोजगारी, महंगाई डायन, सामाजिक तनाव, संस्थाओं पर अविश्वास और युवाओं की बेचैनी, क्या यही वह रास्ता था, जिसके लिए देश ने इतनी उम्मीदों के साथ सत्ता सौंपी थी? तब लोगों ने एक चमकदार भविष्य का सपना देखा था। आज नई पीढ़ी हिसाब मांग रही है और इसी मोड़ पर सच्चा हकीकत से वाबस्ता जननायक राहुल गांधी दिखाई देते हैं।
संघ का तंज और सच्चाई की राजनीति
एक समय था जब राहुल गांधी को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मंडली के द्वारा मजाक बनाना राजनीतिक उद्योग बना दिया गया था। उनके हर वाक्य, हर कपड़े, हर यात्रा और हर गतिविधि को मजाक का विषय बनाया जाता था, लेकिन वह उस झूठ और पाखंड के सामने सच्चाई के साथ मजबूती से खड़े रहे और अपनी बात कहते रहे, हारे नहीं, हताश नहीं हुए, पार्टी में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से लड़ाई लड़ते रहे। लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि प्रचार से बनाई गई छवि और जमीन पर बने रिश्ते में बहुत अंतर होता है। प्रचार आपको नेता बना सकता है, लेकिन लोगों के बीच जाकर उनके अनुभवों को सुनना आपको अपना बना सकता है। राहुल गांधी इसी सच्चाई की राजनीति के प्रतिनिधि के रूप में उभर रहे हैं।
पितृसत्ता को चुनौती और सामाजिक संरचना पर प्रहार
पुणे में महिलाओं के साथ उनका संवाद केवल एक कार्यक्रम नहीं था। वहां राहुल गांधी ने सत्ता की राजनीति से अलग समाज की सत्ता पर सवाल उठाया, पितृसत्ता पर सवाल। उन्होंने महिलाओं से कहा कि वे किसी की मिल्कियत नहीं हैं। यह वाक्य भारतीय समाज की उस पुरानी व्यवस्था पर चोट है, जिसमें महिला को बेटी, बहन, बुआ, मासी, नानी, पत्नी और मां के रिश्तों में तो सम्मान दिया जाता है, लेकिन एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने में समाज को सदियां लग जाती हैं। यहां तक कि राजनीति भी महिला को अक्सर वोटबैंक, लाभार्थी या सुरक्षा की जरूरत रखनेवाली नागरिक के रूप में देखती है। राहुल गांधी ने इस सोच को सीधे चुनौती दी, ‘Smash the Patriarchy’ यानी पितृसत्ता को ध्वस्त करो। भारतीय राजनीति में एक पुरुष राजनेता की ओर से आया यह नारा इसलिए असाधारण है कि इसमें कोई गोलमोल भाषा नहीं है। कोई ‘नारी शक्ति वंदन’ जैसा सुरक्षित राजनीतिक वाक्य नहीं है, जिसे हर मंच पर बोला जा सके और जिसके भीतर की असमानता पर चर्चा न करनी पड़े। यहां व्यवस्था को चुनौती है और व्यवस्था को चुनौती देना आसान नहीं होता।
राहुल गांधी ने महिलाओं से जुड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के पुराने वीडियो का संदर्भ उठाया। गालियों के सवाल पर प्रधानमंत्री से सवाल किए। मनुस्मृति और मनुवादी सोच की उस सामाजिक संरचना पर चोट की, जिसमें बराबरी की बात करना ही विद्रोह माना जाता है, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संविधान मानती है, यह उसके अनुयायियों के द्वारा लिखित पुस्तकों में अंकित है। राहुल गांधी की राजनीति का बदलता हुआ केंद्र है। वे अब केवल सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे, बल्कि समाज की उन संरचनाओं पर सवाल उठा रहे हैं, जिनसे सत्ता की राजनीति ताकत लेती रही है। महिला, दलित, पिछड़ा, युवा, ये केवल सामाजिक समूह नहीं हैं। ये भारत की उस बहुसंख्यक आबादी की पहचान हैं, जिसे लंबे समय तक सत्ता की भाषा में सुना कम और इस्तेमाल ज्यादा किया गया। अगर इन वर्गों के सवाल लगातार राजनीति के केंद्र में रहेंगे तो भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकती है।
नई पीढ़ी का आकर्षण और बदलती राजनीति
२०१४ में नरेंद्र मोदी नई पीढ़ी के राजनीतिक आइकन बनाकर प्रस्तुत किए गए थे। आज २०२६ में दृश्य बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। नई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा राहुल गांधी की तरफ आकर्षित होता नजर आ रहा है। इसका कारण केवल सोशल मीडिया नहीं है। कारण यह है कि राहुल गांधी अब उस भाषा में बात कर रहे हैं, जिसमें युवाओं को अपनी जिंदगी दिखाई देती है। वह बेरोजगारी की बात करते हैं। शिक्षा की बात करते हैं। पेपर लीक की बात करते हैं। जाति की बात करते हैं, दबे-कुचले पिछड़ों की आवाज बन रहे हैं, उनके हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं, यह सब देख रहे हैं।
महिलाओं की स्वतंत्रता की बात करते हैं। और सबसे बड़ी बात, वे मंच पर हमेशा सर्वज्ञाता बनने की कोशिश नहीं करते। युवाओं को यही सहजता आकर्षित करती है। नई पीढ़ी उपदेश कम सुनना चाहती है, संवाद ज्यादा करना चाहती है। उसे भाषण से ज्यादा सवाल चाहिए। उसे पाखंड से ज्यादा स्पष्टता चाहिए।
२०१४ में राजनीति का चुंबक नरेंद्र मोदी थे। आज क्या वह चुंबक धीरे-धीरे राहुल गांधी की तरफ खिसक रहा है? इस सवाल का अंतिम जवाब अभी भविष्य देगा। लेकिन पुणे की ‘राहुल-राहुल’ की गूंज को अनसुना करना भी राजनीतिक भूल होगी। राजनीति में बदलाव पहले नारे में नहीं आता। बदलाव पहले मन में आता है। नारा तो बाद में उसका सार्वजनिक रूप बनता है। २०१४ में देश ने एक सपना देखा था। उस सपने का परिणाम देश के सामने है- शून्य के तौर पर, कोई सपना साकार नहीं हुआ, नफरत के सिवा। अब शायद नई पीढ़ी नए सवालों के साथ खड़ी है। वह पूछ रही है कि विकास किसका हुआ? रोजगार कहां है? महिलाओं की आजादी कहां है? दलित-पिछड़ों की बराबरी कहां है? संस्थाएं किसकी हैं? और लोकतंत्र आखिर किसके लिए है? इन सवालों का सामना कोई भी सत्ता केवल नारों से नहीं कर सकती। पुणे में गूंजता ‘राहुल-राहुल’ इसी नए दौर की पहली तेज आवाज है और अगर यह आवाज सचमुच देश की नई पीढ़ी की आवाज बन गई तो भारतीय राजनीति को बहुत जल्दी अपने पुराने नक्शे बदलने पड़ेंगे, क्योंकि इतिहास का पहिया हमेशा एक ही व्यक्ति, एक ही पार्टी और एक ही नारे के लिए नहीं घूमता। कभी-कभी जनता खुद नया नारा चुन लेती है।
सत्यमेव जयते।

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